(पहला छंद पंकज भैया की लहलहाती
जुल्फों को समर्पित)
1.
कद छोटा और चाल चपल
सुंदर, चतुर, सुजान,
माथे और सिर में भेद नही
पर मत कीजौ अपमान।
(जमात की भांति इन्होंने भी हमारे
जीवन को आतंकित किया हुआ है)
2.
मत कीजौ अपमान कि
पड़ सकता है भारी,
भारतवर्ष को करे आतंकित
ये भी एक जमात में अधिकारी।
(दावत के नाम पर मेरे साथ किये विश्वासघात
को समर्पित ये पंक्तियां)
3.
है जमात में अधिकारी
और मधुर वचनों से सज्ज,
टालमटोल करे दावत में
बेइंतहां निर्लज्ज।
(दक्षिण के रेस्टोरेंट के मालिक के साथ किये छल को
समर्पित ये पंक्तियां)
4.
बेइंतहां निर्लज्ज पुरुष ये,
डोसा खाते जम के,
पैसों की जब बात है आती
फुर्र हो जाते एक दम से।
(समाज के कल्याण हेतु भगवान से प्रार्थना के लिए ये पंक्तियां)
5.
फुर्र हो जाते एक दम से ये
कंजूस सुक्खी लाला,
भगवान कर दुश्मन का भी
पड़े ना इनसे पाला।
(ब्रेड पकोड़ा कांड की श्रृद्धाजली को समर्पित)
6.
पड़े न इनसे पाला कि
ये स्वांग रचाते थोड़ा,
'पिज्जा' की ये बात है करते
और खिलाते ब्रेड पकोड़ा।
7.
खाते ब्रेड पकोड़ा खुद भी
नही है शक्तिशाली,
'डॉ' के ये दुम है लगाते
नाम - पंकज चौंसाली।