Thursday, 17 August 2017

जयद्रथ वध...........

This is the second part of a two part poem whose first part was अर्जुन की प्रतिज्ञा।
                                                     [विकिपीडिया से लिया हुआ चित्र ]


कौरवों के लिए आज कैसी है ये स्थिति विकट ,
जयद्रथ को दीखता है आज अपना अंत निकट ,
प्रतिज्ञा की ज्वाला धधकती है अर्जुन की नेत्र में ,
देखते है अब क्या होगा आज कुरुक्षेत्र में।

सूर्य की पहली किरण ज्यों ही धरती पर पड़ी ,
गांडीव पर अर्जुन के उसकी प्रतंच्या चढ़ी ,
सूर्य आकाश में जैसे-जैसे चढ़ता गया ,
कपिध्वज-रथ विद्धवंस मचता वैसे-वैसे बढ़ता गया।                       [कपिध्वज-रथ =अर्जुन-रथ ]

दुर्योधन ने जयद्रथ-सुरक्षा द्रोण कंधो पर रखी  ,
पद्म-व्यूह योजना द्रोण ने फिर जयद्रथ-सुरक्षा हेतु रची ,
बढ़ रहा अर्जुन रण में लिए जयद्रथ-वध की कामना ,
आ गया व्यूह के समक्ष अब होना है द्रोण से सामना।

सहस्त्रों बाण निकल रहे आज अर्जुन की कमान से ,
परन्तु रण में खड़े द्रोण है एक अडिग चट्टान से ,
समक्ष द्रोण के हर युक्ति दिख रही आज विफल है,
परन्तु श्री कृष्ण रखते हर समस्या का हल है।

श्री कृष्ण ने अर्जुन से फिर कुछ ऐसा कहा
सुन कर जिसे पार्थ ने शस्त्रों का अपने त्याग किया,
देख कर अर्जुन को निहत्था, हैरान है सभी यहाँ ,
अचंभित हो द्रोण ने फिर अर्जुन से यह कहा ,
"मैंने यह सीख तुम्हे क्या गुरुकुल में सिखलायी नहीं 
कि रण में शस्त्रों का त्याग एक योद्धा कभी करता नहीं 
ऐसा कृत्य जो करे, मेरा शिष्य हो सकता नहीं ,
मेरा सामना करने योग्य लगता तुम में सामर्थ्य नहीं ,
हे पार्थ! यह दुविधा जो तुम्हारे मन में है पनप गयी ,
तो सुनो इसके केवल हो सकते है दो अर्थ ही 
या तो तुम कायर हो ,योद्धा कहलाने लायक नहीं 
अथवा ओर से तुम्हारी पराजय है स्वीकारी गयी"।

सुन कर द्रोण के कठोर वचन श्री कृष्ण है मुस्कुरा रहे ,
उनकी आज्ञा पाकर फिर अर्जुन ने यह वचन कहे ,
"गुरुकुल में जो है सीखा, मुझे है सब कंठस्थ याद ,
यही शिक्षा तो बन गयी है आज रण में मेरा विषाद  ,                                 [ विषाद =दुःख ]
अब तक गुरु से युद्ध किया, यह रहा मेरा प्रमाद ,                                     [प्रमाद =गलती ]
करता हूँ लेकिन अब मैं अपने सभी शस्त्रों का त्याग ,
गुरु से मिले जो मुझे, स्वीकार है वह पराजय भी आज"। 

सुन कर अर्जुन के वचन भगवन पुन: मुस्कुरा रहे ,
नेत्रों-नेत्रों में द्रोण को सब वचन है समझा रहे ,
द्रोण ने मार्ग छोड़ा ,मन उनका था पिघल गया ,
"विजय भव अर्जुन" अनायास ही मुख से निकल गया।

अब पथ खुला है अर्जुन का,गांडीव ऐसे वह चला रहा,
युद्ध-क्षेत्र में चारों और त्राहि-त्राहि है मचा रहा ,
सैकंडो योद्धा रण-क्षेत्र में आज है अर्जुन से भिड़े,
प्राणो से मुक्ति पाकर अब दिख रहे भूमि पर पड़े। 

सूर्यास्त है निकट, कुछ ही घड़ियाँ अब  शेष रहीं
व्यूह के भीतर अर्जुन है फिर भी दिख रहा जयद्रथ नहीं
अब तो लगभग तय है की अर्जुन की जलेगी चिता यहीं।

अर्जुन की व्यथा को देखकर श्री कृष्ण ने उपाय कर दिया,
अपने सुदर्शन चक्र से विशाल सूर्य को ढक दिया ,
दोनों सेनाओं को अब सूर्यास्त का था भ्रम हुआ ,
युद्ध समाप्ति का घोतक दोनों और शंख-नाद हुआ ,
जयद्रथ प्रसन्न है समक्ष अर्जुन के खड़ा ,
कहना लगा तू मुर्ख है ,व्यर्थ ही इतना लड़ा ,
अब जला चिता मेरे समक्ष जैसा था तूने प्रण लिया।

अर्जुन निःशब्द है आज कुरुक्षेत्र में खड़ा
आत्मदाह से पूर्व कृष्ण-आशीर्वाद लेने बढ़ा ,
जो इस संसार को अपनी इच्छा से रहे चला ,
ऐसे कृष्ण ने अर्जुन-मस्तक पर हाथ रखते हुए कहा
"गुरु का आशीर्वाद अपने क्या तुमको स्मरण नहीं ,
ऐसे शिष्य को रण-क्षेत्र में मिल सकती कभी पराजय नहीं ,
है विजय-आशीर्वाद गुरु का जिस पर,जा सकता ऐसे व्यर्थ नहीं,
जिस सूर्यास्त से, हे पार्थ! आज तुम्हारा संताप है ,                                
वह सूर्यास्त है नहीं ,मेरे सुदर्शन का प्रताप है ,
उठा लो गांडीव तुम जो धरती पर है पड़ा हुआ ,
सूर्य अभी ढला नहीं बस सुदर्शन से है ढका हुआ ,
उठा कर गांडीव तुम जयद्रथ-वध कर दो अभी 
अंतिम किरण सूर्य की धरती पर नहीं पहुंची अभी"।

अर्जुन उसी क्षण गांडीव की ओर बढ़ा ,
उठा लिया गांडीव उसने ,लिया उस पर पशुपता चढ़ा ,
दिख रहा है जयद्रथ-मस्तक अपनी पिता की गोद में पड़ा ,
पांडवों में उल्लास है ,पूर्ण अर्जुन का प्रण हुआ ,
चौदहवे दिवस का आज खत्म है रण हुआ ,
श्री कृष्ण के प्रताप से इस तरह जयद्रथ-वध हुआ।
 


                                                                                               --   विश्वजीत सिंह
























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