Saturday, 19 August 2017

कोरे कागज़ के किनारे ......

[यह कविता प्रथम दृष्ट्या निराशावादी लगती है किन्तु अगर इसे नीचे से ऊपर पढ़ा जाये तो यह आशावादी हो जाती है। यह प्रमाण है इस सत्य का कि कोई भी परिस्थिति निराशावादी नहीं होती ,जरुरत होती है तो केवल अपना दृष्टिकोण बदलने की ]
[ यह कविता इस बात का भी उदाहरण है की शब्द शक्तिशाली होते है। अगर इस कविता से 'फिर ' हटा दिया जाये तो यह निरर्थक हो जाती है ]


कोरे कागज़ के किनारे 
कुरेदी कु कामनायें
लम के माल के कारण

फिर 

सूखी स्वप्न-स्याही सारी ,
रका मय, रके भी संगी-साथी ,
स्त-मोला तवाला मैं
संसार,मय से संघर्षरत
का था ,मा था

                                                                                  -विश्वजीत सिंह

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