[यह कविता प्रथम दृष्ट्या निराशावादी लगती है किन्तु अगर इसे नीचे से
ऊपर पढ़ा जाये तो यह आशावादी हो जाती है। यह प्रमाण है इस सत्य का कि कोई
भी परिस्थिति निराशावादी नहीं होती ,जरुरत होती है तो केवल अपना दृष्टिकोण
बदलने की ]
[ यह कविता इस बात का भी उदाहरण है की शब्द शक्तिशाली होते है। अगर इस कविता से 'फिर ' हटा दिया जाये तो यह निरर्थक हो जाती है ]
कोरे कागज़ के किनारे
कुरेदी कुछ कामनायेंकलम के कमाल के कारण
फिर
सूखी स्वप्न-स्याही सारी ,
सरका समय, सरके सभी संगी-साथी ,
मस्त-मोला मतवाला मैं
संसार,समय से संघर्षरत
थका था ,थमा था।
-विश्वजीत सिंह
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