सामर्थ्य है अनंत जिनकी भुजाओं में
बातें वृथा करते नहीं है जो हवाओं में
सहर्ष स्वीकारते है जीवन में जो सहा
भीड़ में घूमते नहीं है जो यहाँ-वहां।
परिणाम में देखते नहीं कभी वे अपना लाभ
सज्जन है वे भीड़ से कहते है पहले आप
रहते है उत्साहित परन्तु होते नहीं अधीर
उन्ही के मस्तक पर सुसज्जित होता विजय-अबीर
पर्वत झुके जाते है जिनके सामर्थ्य के सामने
काल भी दिशा बदलता है उन्ही के सामने
कार्यों से सिद्ध करते है वे अपना जन्म
धन्य होती है धरा उठाकर उनके कदम।
करोड़ों में चमकता दीखता है एकमात्र जो ,
लक्ष्य से भटकता नहीं है लेश-मात्र जो
बल से नहीं अपितु लेता बुद्धि से काम जो
सफल होता है जग में कमाता है नाम वो
कठिन परिस्थिति हो भले रहते हैं वे अड़े
शत्रु हो बहुतेरे परन्तु रहते है वे खड़े
तोड़ देते है आ जाये समक्ष पर्वत विशाल जो
वीर अपने प्रताप से छका देते है काल वो।
अपने प्रताप से देता जो समुद्र को सुखा
काल भी इन्ही के समक्ष है दीखता झुका
राहों में हमेशा जिसके बिछी काँटों की सेज है
बोझ कंधो पर पड़े फिर चलता वह तेज है
चल पड़ा अगर वो फिर न कभी रुका
इसी काल में अपने ऋण देता सभी चुका।
हिंसा करते नहीं रखते तन शुद्ध है
प्रार्थना करते है रखते मन शुद्ध हैं
परिस्थिति इनके समक्ष भले विरुद्ध है
संकट में है फिर भी रखते चरित्र शुद्ध है।
कर्म करना ही यहाँ जिनका धर्म है
व्यर्थ समय गवाना लगता जिन्हे अधर्म है
परोपकार करना जिनके लिए सुकर्म है
निर्णय लेते दृढ रखते स्वभाव नर्म है
अधिकार जन्म के माध्यम लेते नहीं कभी
कर्म से अपने इसको कमा लेते यहीं।
कार्य-चुनाव में अपना स्वार्थ जो नहीं सोचते
सफलताओं को अपनी जी से नहीं है जोड़ते
अथक परिश्रम से यहाँ जो कभी बचते नहीं
कार्य कठिन हो भले ,बोझ-तले दबते नहीं
संसार की अग्नि में जब खुद है वे जले
तपकर निकले जब , विश्व को महापुरुष मिले।
हर पल यहाँ ये मेहनत करते हुए दीखते
कोई पल ऐसा नहीं जिसमे कुछ ये नहीं सीखते
स्थिर रहते है सब ,तब करते चरित्र-विस्तार ये
नए सवेरे में करते है नव निर्माण ये।
कार्य करके उदाहरण बन जाते है जो
असफलताओं का अपनी कारण न देते जो
शरीर जिनका दुरुस्त ,मस्तक तना हुआ
वही वीर शिखर पर बैठा है महान बना हुआ।
--विश्वजीत सिंह
बातें वृथा करते नहीं है जो हवाओं में
सहर्ष स्वीकारते है जीवन में जो सहा
भीड़ में घूमते नहीं है जो यहाँ-वहां।
परिणाम में देखते नहीं कभी वे अपना लाभ
सज्जन है वे भीड़ से कहते है पहले आप
रहते है उत्साहित परन्तु होते नहीं अधीर
उन्ही के मस्तक पर सुसज्जित होता विजय-अबीर
पर्वत झुके जाते है जिनके सामर्थ्य के सामने
काल भी दिशा बदलता है उन्ही के सामने
कार्यों से सिद्ध करते है वे अपना जन्म
धन्य होती है धरा उठाकर उनके कदम।
करोड़ों में चमकता दीखता है एकमात्र जो ,
लक्ष्य से भटकता नहीं है लेश-मात्र जो
बल से नहीं अपितु लेता बुद्धि से काम जो
सफल होता है जग में कमाता है नाम वो
कठिन परिस्थिति हो भले रहते हैं वे अड़े
शत्रु हो बहुतेरे परन्तु रहते है वे खड़े
तोड़ देते है आ जाये समक्ष पर्वत विशाल जो
वीर अपने प्रताप से छका देते है काल वो।
अपने प्रताप से देता जो समुद्र को सुखा
काल भी इन्ही के समक्ष है दीखता झुका
राहों में हमेशा जिसके बिछी काँटों की सेज है
बोझ कंधो पर पड़े फिर चलता वह तेज है
चल पड़ा अगर वो फिर न कभी रुका
इसी काल में अपने ऋण देता सभी चुका।
हिंसा करते नहीं रखते तन शुद्ध है
प्रार्थना करते है रखते मन शुद्ध हैं
परिस्थिति इनके समक्ष भले विरुद्ध है
संकट में है फिर भी रखते चरित्र शुद्ध है।
कर्म करना ही यहाँ जिनका धर्म है
व्यर्थ समय गवाना लगता जिन्हे अधर्म है
परोपकार करना जिनके लिए सुकर्म है
निर्णय लेते दृढ रखते स्वभाव नर्म है
अधिकार जन्म के माध्यम लेते नहीं कभी
कर्म से अपने इसको कमा लेते यहीं।
कार्य-चुनाव में अपना स्वार्थ जो नहीं सोचते
सफलताओं को अपनी जी से नहीं है जोड़ते
अथक परिश्रम से यहाँ जो कभी बचते नहीं
कार्य कठिन हो भले ,बोझ-तले दबते नहीं
संसार की अग्नि में जब खुद है वे जले
तपकर निकले जब , विश्व को महापुरुष मिले।
हर पल यहाँ ये मेहनत करते हुए दीखते
कोई पल ऐसा नहीं जिसमे कुछ ये नहीं सीखते
स्थिर रहते है सब ,तब करते चरित्र-विस्तार ये
नए सवेरे में करते है नव निर्माण ये।
कार्य करके उदाहरण बन जाते है जो
असफलताओं का अपनी कारण न देते जो
शरीर जिनका दुरुस्त ,मस्तक तना हुआ
वही वीर शिखर पर बैठा है महान बना हुआ।
--विश्वजीत सिंह
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