Monday, 14 August 2017

अर्जुन की प्रतिज्ञा........

This is a two part poem ,the parts being a) अर्जुन की प्रतिज्ञा b) जयद्रथ-बध। ..... Currently, first part is being published here.........


विश्व-प्रेरणा जो बना
उस इतिहास का प्रमाण है ,                           
यह धर्म-क्षेत्र महान है ,
यह कुरुक्षेत्र-मैदान है।

कुरुक्षेत्र में अब तक थे पितामह खड़े हुए ,
सेनापति थे जब तक रहे कौरव अड़े हुए ,
विडम्बना है ,अपनी विजय पर पांडव है शोकान्वित हुए
पतन भीष्म का हुआ, द्रोण सेनापति हुए।

तेरहवे दिवस कुछ प्रसंग है ऐसा हुआ ,
चक्रव्यूह की आड़ में अधर्म एक भयावह हुआ ,
द्रोण के समक्ष ये अपराध है कैसा हुआ ?
अभिमन्यु रण-क्षेत्र में निढाल है मरा हुआ।

अभिमन्यु-बध की सूचना ज्यूँ ही अर्जुन को मिली ,
क्रोध की हुंकार से समस्त-प्राणी सकल धरती हिली ,
कपकपाते हाथ है ,नेत्रों में उसके रक्त है ,
अर्जुन-मुख से फूटते आज बस यही शब्द है,
"अपनी मृत्यु का आवाहन आज है किसने कर दिया ?
धर्म की चिता जला ये अधर्म है किसने कर दिया ?
एक बालक के साथ रण में ये छल है किसने कर दिया ?
निहत्थे मेरे पुत्र पर प्राणघात है किसने कर दिया "?

अर्जुन ने श्री-कृष्ण से प्रसंग सारा जान लिया
रक्तिम-काया चमक उठी ,हो कुपित फिर उसने कहा
"प्रतिशोध जो ना लिया मिले मुझे मुक्ति नहीं,
जयद्रथ-बध जो रोक दे अब ऐसी कोई युक्ति नहीं ,
गांडीव की सौगंध खा प्रतिज्ञा लेता हूँ अभी ,
इस पार्थ के सामर्थ्य में जो कल रह जाये कुछ कमी,
सूर्यास्त से पहले अगर ,जयद्रथ-साँसे जो ना थमी ,
गांडीव को फिर त्याग कर भस्म हो जाऊँ तभी ,
कुंती-पुत्र अर्जुन की जल जाये फिर चिता यहीं,
कुंती-पुत्र अर्जुन की जल जाये फिर चिता यहीं "।

                                                                                           -विश्वजीत सिंह

















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