Saturday, 12 August 2017

मेरी साँसे अभी बाकी हैं.....

देखता हूँ मैं चारो ओर 
ना हर्ष है ,न उल्लास है ,
मेरे देशवासी स्वयं ही 
उड़ा रहे मेरा उपहास है। 

मेरा इतिहास पुनः तुमको 
आज मैं समझाता हूँ ,
भूल चुके हो जिसको तुम 
गाथा वह बतलाता हूँ। 

मेरे देशवासियों का था 
मुझ पर कभी अडिग विश्वास,
जब अन्य राष्ट्र थे बने नहीं 
तब का है मेरा इतिहास। 

मैं ही हूँ जिसकी रक्षा 
स्वयं करता भगवान है,
दक्षिण-पूर्व-पश्चिम में समुद्र 
उत्तर में हिमालय महान है। 

मैंने ही विश्व को सर्वप्रथम
सभ्यता का वरदान दिया,                         (सिंधु घाटी सभ्यता )
बहुदा -बहुदा जो लोग बसे
उन सबका सम्मान किया। 

मैंने ही विश्व को सर्वप्रथम
एक दिव्य लिखित ग्रन्थ दिया ,
वेदो के रूप में तुमको मैंने 
ज्ञान अमूल्य अनंत दिया। 

मैंने ही विश्व को सर्वप्रथम
सुगठित सुसज्जित धर्म दिया ,
जो सनातन था उस रूप में तुमको 
धर्म रूपी एक कर्म दिया। 

मैंने ही विश्व को सर्वप्रथम
दो ग्रन्थ बड़े ही भव्य दिए ,
रामायण ,महाभारत जैसे
ज्ञान रूपी महाकाव्य दिए। 

वो मैं ही था जिसने विश्व को 
दिए महावीर ,गौतम सिद्धार्थ,
उनके अनुसरण से तुम्हे मिला 
जीवन जीने का ज्ञान यथार्थ। 

मैंने ही महान सिकंदर के 
विश्व -विजय रथ को रोका ,
मेरे उपलब्धियों को देख-देख 
सारा विश्व था कभी चौंका। 

मैंने ही विश्व को सर्वप्रथम
शासन का सुलभ ज्ञान दिया ,
एक पुस्तक रूपी तुमको मैंने 
अर्थशास्त्र महान दिया।     

सीमा -विस्तार की लालसा में 
ना मैंने किसी का हनन किया ,
इस हिंसक दुनिया में मैंने 
प्रेम-दया का उदहारण दिया। 

जननी बन कर मैंने सदा 
इस विश्व को पोषित किया ,
विश्व-गुरु बना कर सभी ने 
 मुझको था कभी विभूषित किया। 

महापुरुष भी मैंने तुमको 
अनगिनत ,असंख्य दिए ,
महाराणा ,शिवाजी और लक्ष्मी
चरक,आर्यभट्ट ,कालिदास दिए। 

परन्तु अब मैं तुम्हारी शान नहीं 
क्यूंकि तुमको यह ज्ञान नहीं ,
जिस देश पर तुम करते गर्व नहीं 
वह बन सकता कभी महान नहीं। 

धर्म,जात-पात को लेकर 
विद्धवंस मेरा समीप है ,
लेकिन यह भी तुम जान लो 
अभी शेष आशा के कुछ दीप है। 

मुझ पर अभी भी जो करते गर्व 
ऐसे सैनिक महान है ,
मेरे शिक्षक ,मेरे युवा 
हाँ !यही तो मेरी शान है। 

इस स्वतंत्रता दिवस , मेरे बच्चों 
अपने मन में यह ठान लो ,
हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई 
सब भाई है ,यह मान लो।  

इस स्वतंत्रता दिवस , मेरे बच्चों
तुम कुछ ऐसा मंत्र करो ,
देह तुम्हारा स्वतंत्र है 
अब बुद्धि भी स्वतंत्र करो। 

ये विपदा कैसी आन पड़ी
शत्रु की नज़रें इधर झांकी हैं ,
बता दो तुम ऐ!भारतवासियों 
"मरा नहीं मै ज़िन्दा हूँ ,
मेरी साँसे अभी बाकी हैं 
मेरी साँसे अभी बाकी हैं"। 

                                                            --विश्वजीत सिंह 
  






                     





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