Thursday, 10 August 2017

चाणक्य (भाग १).........

सामर्थ्य के सामने जिनके नित पर्वत झुके ,
अत्याचारी शासकों के विजय-रथ है रुके ,
सहस्त्रों वर्षों में एक बार होता है उनका जन्म ,
धन्य हुई है धरती उठाकर उनके कदम।

भरी सभा में हो गया प्रसंग ऐसा एक बार,
उपहास ब्राह्मण का उड़ा ,आघात हुआ उस पर अपार,
वीर ब्राह्मण ने अपमान को था न सहा,
हो कुपित फिर दरबार में उसने कहा,
"ये खोलता हूँ अपनी शिखा ,बांधूगा उसको तभी ,
आ जाओगे घुटनों पर मेरे समक्ष जब तुम सभी ,
प्रण लेता हूँ कि मगध को मैं करूँगा नन्द-मुक्त
हाँ ,इसी काल से हो गया समझो तुम्हारा भाग्य-सुप्त"।

सुन कर ये दरबार में उसकी उड़ी थी खिल्लियां ,
अनभिज्ञ नहीं थे जानते तूफ़ान से पहले चमकती बिजलियाँ।
हीरे को शीशा समझ दिया दरबार से उसको निकाल ,
है सत्य यह कि कठिन समय में बुद्धि पर पड़ता अकाल।

कुंठा लिए अपने हृदय में उसका समय था बीतता
प्रतिशोध के पौधे को था वो अपने मन में सींचता।
समय जिसको बुझा दे ज्वाला वो ज्वाला नहीं ,
धीरज धरकर जो बने होती वही युक्ति सही।

सत्य है की भाग्य का पहिया निरंतर घूमता,
उड़ता है जो आसमां में वो धरा भी चूमता।
ये भाग्य था की ब्राह्मण अपनी राह में जब बढ़ रहा,
पड़ी उसकी नज़र ,बालकों का खेल जहाँ था चल रहा।
आभा थी एक बालक की ऐसी उन बालकों के मध्य
चंद्र जैसे है चमकता असंख्य तारों के मध्य।

उसकी छवि को देख कर दूर खड़ा वह ना रहा,
पहुंचा निकट ,बालक से फिर उसने कहा
"हो कौन तुम जो सूर्य से हो चमक रहे,
प्रताप है ये तुम्हारा या भाग्य के सहारे दमक रहे ?"

सुन कर इन वाक्यों को बालक ने कहा
"भाग्य क्या होगा मेरा, मैं चरवाहों में पला ,
आश्रित नहीं हूँ भाग्य पर चाहे यह जागे या रहे सुप्त ,
साधारण मैं नहीं कोई बालक और नाम है मेरा चन्द्रगुप्त। 

बालक के शब्दों को सुन उसने भाग्य उसका भान लिया 
मगधराज होगा ये बालक ऐसा था उसने ठान लिया। 
ले गया खरीद कर उस बालक को वह वहां 
ज्ञान-भूमि ,पुण्य-भूमि तक्षिला थी जहाँ। 

ज्ञान विधि-समस्त का वहां था उसको मिला ,
कलम और तलवार के विचित्र संयोग में था वो पला 
सोना था ,वर्षों तप कर अब वह कुंदन बना 
खेलने की उम्र में अपनी वह योद्धा बना। 

चन्द्रगुप्त को साथ ले, गया वह ब्राह्मण निकल 
घूमा उसने अपने पगों पर ये विशाल भारत सकल 
"हैं वीर जो और युवा है ,
अपनी शर्तो पर जिया है ,
जिनके लिए माँ ,माँ भारती है ,
 विजय गाथा जिनकी आरती है,
ऐसे युवान जो है त्रस्त अत्याचार से ,
आ जाये मेरे साथ लेकिन विचार के ,
इस पथ पर चलने वाले को मिलेगा अमरता का वरदान,
माँ भारती को मुक्त करना ये है सबसे पुण्य काम"। 
थे शब्द यही थे गूंजते रहते थे वे दोनों जहां 
जोशीले युवा सुन इनको खींचे आते थे तुरत वहां। 

समय बीता, देखते ही देखते उनके समक्ष 
हो गयी तैयार सेना नन्दो के विपक्ष
लेकर सेना को चन्द्रगुप्त ऐसा चला 
उसके प्रताप से सर्वप्रथम पंजाब था हिला 
चीरती हुई अत्याचार को चलती थी उसकी कटार
खेल खेल में जा पंहुचा नन्द साम्राज्य तक उसका विस्तार। 

अब परीक्षा की घडी थी ,भाग्य का ये खेल था 
चन्द्रगुप्त और नन्द की सेना का शेष मेल था। 

नन्द को जब मिली खबर तब उसने भीषण हुंकार किया 
"कर दूंगा नष्ट उस बालक को" ऐसा उसने था प्रण लिया। 
लेकर अपनी सेना विशाल वो जा पहुंचा मैदान में 
जहाँ खड़ा था चन्द्रगुप्त निर्भीक अपनी शान में।
देख कर हुए थे जिसे सिकंदर के हौंसले पस्त 
ऐसी विशाल सेना खड़ी थी अब चंद्र के समक्ष। 

अनुभवहीन सेना, युवा सेनानी क्या हो पाता सफल ?
पर सत्य है के समक्ष बुद्धि के बल होता हरदम विफल। 
साम-दाम-दंड-भेद से खेली जाती जो नीति 
उस नीति का ज्ञाता था वह ,जिसको कहते राजनीति। 

व्यस्त था जब नन्द युद्ध के काज में ,
छिड़ चुका था गृह्ययुद्ध उसके ही राज में 
अभी युद्ध शेष था किन्तु निर्णय था हो चुका 
मगध का अधिकार नन्द से कुछ क्षण में था छीन चुका। 

देखकर अपनी पराजय नन्द ने युद्ध रोक दिया 
अपनी संपत्ति और राज्य चन्द्रगुप्त को सौंप दिया 
बदले में चंद्र ने उसे अनुदान दिया 
राज्य छोड़ने की शर्त पर जीवनदान दिया। 

जब मगध को छोड़कर नन्द था चला 
मंत्री-प्रधान के आसान पर बैठा वही ब्राह्मण मिला। 
चकित हो नन्द ने उससे प्रश्न किया 
"हे विप्र वर !तुम कौन हो जिसने एक प्रण के लिए,
समस्त मेरे वंश का जड़ से विनाश किया" ?
"तुम जानना चाहते हो कि मेरा है नाम क्या ,
मैं अर्थशास्त्र का रचयिता ,कहते है मुझे चाणक्य"।

                                                                                      -विश्वजीत सिंह




















 















 




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