समय यदि संकट का हो तो प्रेम-गीत व्यर्थ हैं
बुद्धि से अपनी यह विचार लो ,
प्राण जो संकट में हों ,शत्रु समक्ष रण में हों
कलम छोड़ हाथ में तलवार लो।
अन्याय की जब आंधियां दीपक बुझाये न्याय का
तब वीरता का अपनी तुम प्रमाण दो,
न्याय की परिभाषा तलवार पर अपनी लिखों और
शत्रुओं की सीने में उतार दो।
है कोई कठिनाई नहीं जिससे तुम भयभीत हो
की तुम भारत-वीर-संतान हो ,
परिस्थिति कठिन लगे, ना कोई युक्ति मिले तो
दाम-दंड-भेद का प्रमाण दो।
संसार से क्या जूझना, संसार की यह रीत है और
संसार का यही विचित्र तथ्य है ,
वीर का सुख स्वप्न है ,राह उसकी है जटिल
कठिनाइयां ही एकमात्र सत्य है।
समय-प्रवाह प्रचंड है पर जो खड़ा उद्दंड है
तू उस वीर सा महान बन,
व्यर्थ समय तू न गवां,शरीर को तू कष्ट दे कि
मिटटी में ही मिलना है ये तेरा तन।
मंज़िल जो तेरे है समक्ष ,समय-प्रवाह है विपक्ष
यही तो वीर की असल परीक्षा है ,
तू चलता जा ,तू रुक नहीं
प्रभु की भी आज बस यही इच्छा है।
समय यदि संकट का हो तो प्रेम-गीत व्यर्थ हैं
बुद्धि से अपनी यह विचार लो ,
प्राण जो संकट में हों ,शत्रु समक्ष रण में हों
कलम छोड़ हाथ में तलवार लो।
-विश्वजीत सिंह।
बुद्धि से अपनी यह विचार लो ,
प्राण जो संकट में हों ,शत्रु समक्ष रण में हों
कलम छोड़ हाथ में तलवार लो।
अन्याय की जब आंधियां दीपक बुझाये न्याय का
तब वीरता का अपनी तुम प्रमाण दो,
न्याय की परिभाषा तलवार पर अपनी लिखों और
शत्रुओं की सीने में उतार दो।
है कोई कठिनाई नहीं जिससे तुम भयभीत हो
की तुम भारत-वीर-संतान हो ,
परिस्थिति कठिन लगे, ना कोई युक्ति मिले तो
दाम-दंड-भेद का प्रमाण दो।
संसार से क्या जूझना, संसार की यह रीत है और
संसार का यही विचित्र तथ्य है ,
वीर का सुख स्वप्न है ,राह उसकी है जटिल
कठिनाइयां ही एकमात्र सत्य है।
समय-प्रवाह प्रचंड है पर जो खड़ा उद्दंड है
तू उस वीर सा महान बन,
व्यर्थ समय तू न गवां,शरीर को तू कष्ट दे कि
मिटटी में ही मिलना है ये तेरा तन।
मंज़िल जो तेरे है समक्ष ,समय-प्रवाह है विपक्ष
यही तो वीर की असल परीक्षा है ,
तू चलता जा ,तू रुक नहीं
प्रभु की भी आज बस यही इच्छा है।
समय यदि संकट का हो तो प्रेम-गीत व्यर्थ हैं
बुद्धि से अपनी यह विचार लो ,
प्राण जो संकट में हों ,शत्रु समक्ष रण में हों
कलम छोड़ हाथ में तलवार लो।
-विश्वजीत सिंह।
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