Tuesday, 1 August 2017

श्रीमान सुपुत्र.......

The blog in its introduction says that poems, short stories and novel series would be published here, so keeping up with its words first story,or rather i should say short story, is being published. 'It's always good to start things on a lighter note' has been my mantra always. So, keeping this mantra in mind, this story would be a HASYA KATHA. Cheers!!!!!.......

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हमारे सुपुत्र ने आज तक ऐसा कोई काम नहीं किया था जिस पर हम गर्व कर सकें। कमबख़्त ने आजतक हम पर सिर्फ बदनामी का कीचड ही उछाला था। अब हमें अपने सुपुत्र के नाम से जाने जाना लगा था , जिसका हमे बेहद अफ़सोस है। हिंदी व्याकरण में उसका कोई सानी था ही नहीं। एक बार इन विद्वान ने भरी मंडी में एक गरांडील शरीर की महिला को घास चरने वाले एक जानवर का विशेषण प्रदान कर दिया और विपरीत दिशा में आगे बढ़ गए। अब कहा तो पट्ठे ने सच ही था, लेकिन इस नश्वर संसार के भोले मानुषो को सच का ज्ञान नहीं। वह औरत मुड़ी तो उसने हमको अपने पीछे पाया। अब क्या बताये उनके पति देव जो गैंडे से भीमकाय शरीर वाले थे; उन्होंने ऐसी धुलाई की, कि न खाना खाने लायक रहे और न.........ख़ैर छोड़िये। लेकिन, इस बार हमें उस से बहुत से आशाएं थी क्यूंकि उसने ,और हमको पूरा यकीं है ,गलती से अपना नाम दोहा-गायन प्रतियोगिता में लिखवा लिया था। हमे भी आमों से मतलब था न की गुठलियों से इसलिए हमने अपने सुपुत्र को बुलाया और कहा " सुन कर बहुत अच्छा लगा कि तुमने दोहा-गायन प्रतियोगिता में हिस्सा लिया है। प्रतियोगिता कब है , ज़रा ये तो बतायो"?

सुपुत्र : परसो है।
हम    : अच्छा परसों है , फिर तो तुमने दोहे अच्छे से याद कर लिए होंगे। अच्छा ,ज़रा दो-चार पंक्तियाँ तो सुनाना ज़रा।
सुपुत्र  : वो पिता जी......... मैं वो.......... ।
हम     : क्या मैं वो ,ये वो लगा रखा है। सुधा, ज़रा मेरी कम्बच  ले आना।
सुपुत्र   : सुनाता हूँ ना पिता जी, मैं तो बस अपना गला साफ़ कर रहा था........ एह...हह. म। दोहा इस प्रकार है।
                                           'घर की मुर्गी और अदरक का स्वाद
                                            नाच न जाने आटा गीला'।
हम     : अबे,क्या बक रहा है। ये दोहे नहीं मुहाबरे है और वो भी गलत। घर की मुर्गी ,अदरक का स्वाद ये गलत...... [ अंदर से श्रीमती जी बोली]
श्रीमती: मुझे पहले से ही पता था कि तुम को मेरे हाथ का खाना अच्छा नहीं लगता है। मेर हाथ की बनी मुर्गी तुम्हे अदरक जैसी लगती है।
हम     : अरी चुप करो भाग्यवान। और तू ये कैसे दोहे याद किए तूने। चल कोई कुछ और सुना।
सुपुत्र  :  पिता जी , फिल्मी गाना सुनाऊ क्या ?
हम    : अरे नालायक दोहे सुना।
सुपुत्र  : हां तो सुनिए फिर
                                       'काकड़ पाथर जोड़ के मन का आप खोये ,
                                        बुरा जो देखन में चला मुझसे बुरा न कोई।'
हम    : ये तो सही बोला तूने तुझसे बुरा तो हो ही नहीं सकता कोई इस दुनिया में। अबे ये क्या रीमिक्स कर दिया तूने दोहे का , बेबकूफ की औलाद।
श्रीमती: हाय! इस आदमी को ज़रा भी शर्म नहीं है , छोटे छोटे बच्चो के सामने मुझे बेबकूफ बोल रहा हैं। बेटा ज़रा मेरा फ़ोन ला दे , बताऊ ज़रा पापा जी को की उनकी औलाद क्या क्या दिन  दिखा रही है मुझे।
  [ सुपुत्र तो कोई मौका तलाश रहे थे खिसकने का , वैसे तो वह कोई बहाना मार देता लेकिन आज तो परम आदरणीय और कर्तव्यपरायण पुत्र की भाँती चले फ़ोन लेने ]
हम    : अरे कहाँ भागता है , चुपचाप यहाँ बैठ। और श्रीमती जी पहली बात तो ये कि ये हमारा इकलौता लड़का है तो 'बच्चो' के सामने बेबकूफ बोलने वाली बात मिथ्या है और दूजी बात ये की ये ऊंट जितना बड़ा हो गया है। किसी भी कोण से ये छोटा नहीं है।  इतनी उम्र में इसके दादा जी ने कवितायेँ लिखना शुरू कर दी थी। और तीजी बात ये कि 'बेबकूफ की औलाद' का अर्थ ये भी हो सकता है की में बेबकूफ होऊं।
श्रीमती: फिर ठीक है।
सुपुत्र  : पिता जी! आप ये भूल रहे है की मेरी उम्र में दादा जी ने मदिरा पान भी करना शुरू कर दिया था। 
हम    : ( तनी हुई भवों से हमने उसे देखा ) चुप हो जा नालायक। कुछ और सुना।
सुपुत्र  : बहुत आसान दोहा है ,आपको समझ आएगा
                                         'रहिमन पानी बहाइये , पानी मिलता मुफ्त 
                                          नहीं नहाते रोज जो हो जाते है सुस्त। '
             पिता जी दोहा गलत है जानता हूँ लेकिन भावनाये सच्ची है।
हम    : वाह ! सही जा रहे हो बेटा। बुड्ढा होने जा रहा है , ऐसे तो तुझे प्रतियोगिता वाले अंतिम स्थान देने में भी अपनी बेइज़्ज़ती समझेंगे।
           [ हमने सोचा सख्ती से कोई फायदा नहीं है। हमारा पुत्र है , हम ही इसे सिखाएंगे ]
हम    : चल बैठ बेटा। अब मैं एक दोहा बोलूंगा और तुम उसे दोहराना।
                                           ' ऐसी वाणी बोलिये , मन का आपा खोये 
                                             औरन को शीतल करे आपहुं शीतल होये'
श्रीमती: शीतल ,शीतल कौन है ये शीतल? बताये देती हूँ की मायके चली गयी न तो सकपका जाओगे।
हम    :  अरे श्रीमती जी आपके कानपूर में हड़ताल है क्या ? तुम्हारे सपूत को दोहे याद करा रहा हूँ। तुम चुपचाप खाना बनायो। मुझे खाना आज ही खाना है कल नहीं, इतनी देर हो गयी है।

सुपुत्र  : पिता जी, दोहा सुनिए।
हम    : हां, सुनायो।
सुपुत्र  : 'ऐसी वाणी बोलिये जिससे झगड़ा होय......... सॉरी सॉरी....... तन का आपा खोए..... 
हम    : अबे मन का आप खोये।
सुपुत्र  : हां ,वही खोया पाया।
                                      'ऐसी वाणी बोलिये मन का आप खोये ,
                                       औरन को काजल करे और आपहुं काजल होये '
हम    :(गुस्से में) अरे ये काजल कौन है ? शीतल बोल शीतल।
सुपुत्र  :अच्छा पिता जी !हमेशा आपकी बाली का नाम , कभी हमे भी मौका दीजिये।
हम   :(क्रोध में) अरे नालायक, भाग यहाँ से। शीतल काजल लगा रक्खा है यहाँ।
श्रीमती: (अंदर से ) शीतल से मन नाही भरा तुम्हारा , अब ये काजल को भी ले आये तुम।  हाय राम!मैं बर्बाद हो गयी।
हम   : अरे मूर्ख ! काजल तो तुम्हारा बेटा चिल्ला रहा था। मुझ पर काहे इलज़ाम लगाती हो।
श्रीमती: बेटा सब अपने माँ -बाप से ही तो सीखता है।
हम   : ये बात तो सोने माफिक खरी बोली तुमने। आज मुझे समझ आ गयी की हमारे बेटा इतना मुर्ख क्यों है।
श्रीमती: क्या? मै समझी नहीं।
हम   :(कुटिल मुस्कान के साथ ) अगर तुम ये बात समझने लायक होती तो मैं ऐसी बात बोलता ही नहीं।
                             [बेटा उठ कर भाग जाता है ]

उसके जाने के बाद हमने गहन -चिंतन कर यह निष्कर्ष निकाला कि समय की अथक मांग यह है कि हम अपनी इज़्ज़त बचाने हेतु उसे सिखाएं , जिताने के लिए नहीं , बस इसलिए की वो प्रतियोगिता में आखिरी न आये।
शाम को हमने उसे बुलाया और एक मोटी दोहे की पुस्तक, जो की हमने अपने मित्र बनबारी लाल जी से उधार ली थी ,उसे पकड़ाते हुए आदेश दिया की इसमें से ४-५ दोहे हमें याद करके सुनाये। इतना कह कर हम किसी काम से बाहर चले गए।
जब हम वापस आये तो हमारे सपूत अंदर बैठे कुछ बड़बड़ा रहे थे।
सुपुत्र  : सुनीता ,जब से तुम्हे देखा है खो सा गया हूँ ,
             शोर भरे माहौल मेँ जैसे सो सा गया हूँ। मेरा प्यार..........
हम   :( हम उसे टोकते हुए बोले ) गधे रुक ज़रा ! मै करवाता हु तुझे अभी प्यार।
सुपुत्र: वाह....... खुद की पुस्तक में प्रेम पत्र और डाँट डपट हमारी। अम्मा को बोलयूं क्या अभी ?
हम   : क्या बकता है ? ला दिखा ज़रा। ( वह सच में प्रेम पत्र ही था। बनबारी जी ने भी अच्छा फंसाया। हम बात सँभालते हुए बोले ) मै तो....... ये मेरा नहीं है...... चल , ये पकड़ पचास रुपये और मामले को रफा दफा कर।

  [ बनबारी जी ने भी अच्छा फंसाया , खुद दो बच्चों के बाप हैं लेकिन मन बड़ा ही चंचल है उनका। हमने पत्र को देखा और सोचा बनबारी जी को फंसाया जाये। सोचकर बनबारी जी का चेहरा लाचार, मन में उठा एक कुविचार ,क्यों न किया जाये इन पर अत्याचार ,इसी सोच को ले हम हुए अपनी बाइक पर सवार। बनबारी जी के घर पहुंचे। भाभी जी सामने थी। हम सीधे उनके पास गए और मन में जो कुछ था उगल दिया।  ]

हम   : भाभी जी , बनबारी जी से दोहों की पुस्तक ले गया था , पता नहीं ये कोई पत्र निकला है , क्या लिखा है इसमें , हाँ
               ' सुनीता , तुम्हे देखा है जबसे अधूरी कहानी हो गया हूँ
                 हैंडपंप बिना पानी हो गया हूँ ,
                 रातों को देर तक जागता हूँ ,
                 तुम्हारे घर के......... ( हमे बीच में ही टोक दिया गया )
भाभी जी :  बस भाई साहब ! मुझसे कहते हैं की मुझे अनिद्रा हो गयी है , आज इन्हे इक्कठा सुला दूंगी। 'ज़रा सुनते हो' कहते हुए वे दनदनाती हुई ऊपर चली गयी।
          [हम चुपचाप वहां से खिसक लिए। 'हाय राम मार डाला ,अरे मेरी नाज़ुक कलाई तोड़ेगी क्या'? जैसी भयंकर चीख की आवाज़े उनके घर से आने लगी। खिड़की से एक जूता उड़ता हुआ हमारे सामने आ गिरा। हमने उसे देखा फिर ऊपर देखा और फिर बनबारी जी की  कुटी हुई शक्ल को याद करते हुए मुस्कुराकर आगे बढ़ गए। 
हम जब घर पहुंचे तो देखा के सुपुत्र चादर ताने कुम्भकरण की भांति अपने को नींद के आँचल में समर्पित कर चुके थे। अगले दो दिन तक यही क्रम चला और आख़िरकार प्रतियोगिता की घडी आ ही गयी। 
            हम अपने सुपुत्र को ले उसके स्कूल पहुंचे। उनके प्रधानाचार्य से मिले जो शक्ल से बड़े सज्जन मालूम पड़ते थे परन्तु असल में बड़े उज्जड टाइप के थे।  हर किसी को शक भरी निगाहों से देखते थे। अभी प्रतियोगिता में एक घंटा बाकी था इसलिए सोचा की बाहर घूम कर आया जाये।  बाहर चले तो गेट पर चपरासी बोला " देहाती लगते हो , अंदर किसने आने दिया '? हम बोलना चाहते थे लेकिन गुस्सा पी गए और बाहर निकले। एक खोखे के पास पहुँच कर सोचा की बीड़ी पी ले , लेकिन फिर ख्याल आया की अगर हमारे सुपुत्र के मित्र हमे बीड़ी पीता देखेंगे तो क्या सोचेंगे।  क्या सन्देश जायेगा उन युवाओं को , इसी विचार से हमने बीड़ी को त्याग, सिगरेट की तरफ अपना ध्यान बढ़ाया। हमने सिगरेट खरीदी और वहीँ बैठ गए। वहां पर कुछ चार पांच आदमी बैठे थे और कुछ बात कर रहे थे। ]

पहला : सुना है चौराहे के पीछे वाले त्रिपाठी जी इस बार चुनाव लड़ेंगे।
दूसरा : हां , उन्होंने रिश्वत ली  है।
तीसरा : अरे मैंने तो यहाँ तक सुना है की उन्होंने एक कनस्तर सरसों का तेल रिश्वत लिया है।
चौथा   : बैल कोल्हू या रविंद्र ब्रांड ?
तीसरा : रविंद्र ब्रांड , उसके साथ पेन भी फ्री मिलता है।
चौथा: अच्छा, तभी वह अपना पेन मुझे देने से मना कर रहे थे।
पहला  : तुम्हे क्या लगता है कि त्रिपाठी जी जीत पाएंगे?
दूसरा  : हाँ क्यों नहीं। भले ही उनका वोट बैंक कमजोर हो पर उनका नोट बैंक तगड़ा है।
तीसरा : यार मैंने सुना है की त्रिपाठी जी को सड़क के पागल कुत्ते ने काट लिया था।
पहला  : अच्छा !फिर क्या हुआ ?
तीसरा : होना क्या था , कुत्ते की दर्दनाक मौत हो गयी।
दूसरा : अरे तुम लोग नहीं समझते हो ! सब चुनाव जीतने के हथकंडे है।  अब त्रिपाठी जी चुनाव रैली में सबको अपनी बहादुरी के किस्से सुनाएंगे कि किस तरह उन्होंने अकेले ही विपक्ष के कुत्तों की फ़ौज का सामना किया  और सबको मज़ा चखाया और इस चक्कर में उन्हें काट लिया गया।
        [वे सब उठ कर जाने लगे ]
दूकानदार :  अरे भाई साहब , रुपये तो देते जाइये।
पहला : कैसे पैसे ?
दूसरा  : कौन से पैसे ?
तीसरा : कहाँ के पैसे ?
चौथा   : अबे किस बात के पैसे ?
दूकानदार : जो सिगरेट तुम लोगों ने यहाँ बैठ कर हवा कर दी उसके पैसे।
पहला :   मैंने अभी तो दिया तुम्हे दो सौ का नोट।
दूकानदार : (चौंकते हुए ) दो सौ का नोट?
दूसरा   : हाँ वही १०० -१०० के दो नोट।
तीसरा : अबे वो ही 50 -50 के चार नोट।
चौथा   : अरे हाँ २० -२० के बीस नोट।
दूकानदार  : आप कमाल करते हो बीस -बीस के बीस नोट तो चार सौ हुए , दो सौ नहीं।
पहला  : अच्छा तो हमने तुम्हे चार सौ रुपये दिए है।
दूकानदार  : नहीं , अपने मुझे..........
पहला  :  दो सौ दिए ,अच्छा कोई नहीं , छुट्टे रख  चलते है।
         [चारों वहां से चले गए।  दुकानदार और हमने एक दूसरे के मुँह को देखा , हमने उसे रुपये दिए और फिर स्कूल में जाकर सामने की पंक्ति में अपना स्थान लिया।  प्रतियोगिता शुरू हुई और एक के बाद एक प्रतियोगी आने लगे।  आखिरकार हमारे सुपुत्र भी स्टेज पर आ गए। तालियों की गड़गड़ाहट के साथ हमारे पसीने छूटने लगे। ]

सुपुत्र   : दोहा -गायन की इस प्रतियोगिता में मैं सरस्वती माँ के आशीर्वाद से गाना शुरू करता हूँ।
                                 'रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाए ,
                                  टूटे से जुड़ न पावे जो फेविकोल तब लगाए।'
             
              [ जनता में रोष उत्पन्न होने लगा , परन्तु हमारे सुपुत्र अपने गधे का राग अलापने में मशगूल थे। ]
            वह आगे बोला ' रहिमन फ्रेंड कबीर का ,दोनों गावें दोहे '
                                    और ....................................
             [तब तक जनता में से कोई बोला ' अरे भगाओ इस नामुराद को.... और ना जाने क्या क्या। थोड़े ही देर में अंडे टमाटर की बरसात होने लगी और हम किसी तरह से अपने सुपुत्र को वहां से बचा कर घर लेकर आये और आगे से उसे कुछ भी सीखने से तौबा कर ली ].................................... 



                                                                                                                        --- विश्वजीत सिंह ............  




 













    




           


 












 

 














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