Wednesday, 6 September 2017

मैं भगवान बनना चाहता था......

मैं भगवान बनना चाहता था,
भगवान होना क्या होता है ,
यह महसूस करना चाहता था।

एक दिन मैंने एक बीज मिटटी में बोया ,
उसे सींचा पानी,खाद,प्यार से,
धूप,बरसात, कोहरे से बचाया ,
उसे बीज से पौधा बनाया।

लचीला तना,छोटी-छोटी जड़ें और कोमल पत्तियां,
हलकी हवा से इधर-उधर हिलोरे लेता था
मानो झूला झूलते हुए मुस्कुरा रहा हो ,
फिर एक दिन मैंने उसके तने को
अपने हाथों से कसकर पकड़ लिया,
मेरी उँगलियों की हरकत पर उसका
अस्तित्व धूमिल हो सकता था।

उस दिन जाना की भगवान होना क्या होता है,
मैं उस पौधे का भगवान था,
चाहकर भी उससे नफरत नहीं कर सकता था ,
करता भी तो कैसे? मैंने उसे उसका अस्तित्व
प्रदान किया था ,
हाँ ,कभी-कभी उसकी सड़ती पत्तियों को
काट देता था,
तब लगता था की मेरा पौधा मुझसे नाराज़ हो जाता है ,
फिर याद आया की धर्म-ग्रन्थों में यही तो पड़ा था
की कष्ट हमारे भले की लिए होते है ,
कि भगवान हमारा कभी अहित नहीं चाहता है ,
फिर भी हर बार अपनी गलतियों के लिए
भगवान को ही कोसा करता था।

फिर धीरे-धीरे वह बड़ा हुआ, बूढ़ा हुआ
और एक दिन आंधी में गिर गया।
वह गिरा और अपने साथ मेरे आँगन की
कुछ मिटटी भी उखाड़ ले गया ,
मेरे दिल का एक हिस्सा उसके साथ ही
चला गया कहीं ,
समय बीता और मेरे टूटा हुआ हिस्सा
शायद भर गया ,
लेकिन कभी-कभी उसकी याद आती थी,
शायद कोई दरार बाकी रह गयी ,
शायद समय उसे भर नहीं पायेगा।

फिर याद आया की अनादि काल से
मानव जाति पृथ्वी पर है ,
ना जाने कितने ही इसे अलविदा कह
जा चुके हैं ,
जब सोचा की भगवान के दिल पर
कितनी दरारें होगी ,
तो सिहर गया मै।

भगवान होना क्या होता है ,
ये मैंने जान लिया था
और यह भी की मैं
मनुष्य ही अच्छा हूँ।

                                                                              -विश्वजीत 






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