कागज़ पर लिखे विचारों को करता हूँ प्रदान,
बस्ती-वन में लहरा दो, पढ़ ले पथिक अनजान,
निष्पक्ष भावों को पिघलाकर लिखी नहीं कविता मैने,
स्वार्थ भरा है इसमें मेरा,शामिल है अभिमान।
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कविता में लिखे शब्दों से मिल सकता है ज्ञान,
पढ़े इसे श्रोतागण लेकिन पहले यह ले जान,
विश्व-ज्ञान पढ़ने पर इसको तुम्हे विदित हो जायेगा ,
छूटे सभी विसंगति जग में, छूटे न अभिमान।
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ब्राह्मण,पंडितों के चरणों में पड़ता है जजमान,
अपने पापों को धोता है कर गंगा स्नान,
हवन करता नित पुनीत अनल में ,गंगाजल खूब चढ़ाता है
कर्म करे यह सारे फिर भी जाता ना अभिमान।
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सूरज निकले उससे पहले जग जाता इंसान,
समय निकाल पढ लेता है दिन भर पांच अजान,
माला जपता है, मस्जिद चक्कर भी खूब लगाता है,
खुदा-खुदा रहता है जुवां पर औ' रहता अभिमान।
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सुबह-सुबह क्यों शोर मचाता,अन्य करे विश्राम,
कोई धुआं उड़ाता घर से करे प्रकृति-नुकसान,
धर्म-भेद से परे है जग में वही स्वच्छन्द घूमता है,
जीवन जिसका साधारण है जिसमे ना अभिमान।
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झुके मूर्तियों के समक्ष, खड़े मनुष्य हैरान,
पोथी-पत्रों में मोक्ष ढूँढ़ते हो चुके सब परेशान,
इतिहास साक्षी है जग में मोक्ष उसी को मिलता है,
जो आग लगा पोथी-पत्रों में छोड़ता है अभिमान।
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जगत जीतने से नहीं बनता कोई सम्राट महान,
युद्ध से जीती हुई धरा पर नहीं मिलता सम्मान,
इतिहास साक्षी है जग में गुणगान उसी का होता है,
दया,करुणा,सह्नशीलता जिसमे औ' ना हो अभिमान।
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इंद्र को कर दिए कर्ण ने कानन-कुण्डल दान,
कवच-रहित लड़ा था रण में रश्मिरथी महान,
कर्ण-वध महाभारत में क्या हो पाता संभव कभी,
निहत्थे कर्ण पर वार ना करता यदि छोड़ अर्जुन अभिमान।
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धन-कुबेरों की तिजोरी में बंद है उनकी जान,
मदांध दुनिया ताकत,दौलत में, हाय, कैसी अज्ञान,
कोई सूक्ष्म रखता है यहाँ पर कोई रखे विशाल
अपना-अपना जीवन और अपना-अपना अभिमान।
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शोर भले हो जग में सन्नाटा रखता है श्मशान,
सन्नाटो में चीख-चीख कर देता है यही ज्ञान,
मिट्टी का जो बना हुआ था, मिट्टी में मिल गया यहीं,
जग में लिए जिसे घूमते अब कहाँ वह अभिमान ?
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प्राप्त शान्ति हुई नहीं करे पुण्य औ' दान,
धर्मग्रंथ पढ़ लिए सभी, मिला यही बस ज्ञान,
शांति-सुख पाकर जग में वही प्रसन्न चमकता है,
पुण्य-दान भले करे ना जिसने, बस ना करा हो अभिमान।
-विश्वजीत सिंह
बस्ती-वन में लहरा दो, पढ़ ले पथिक अनजान,
निष्पक्ष भावों को पिघलाकर लिखी नहीं कविता मैने,
स्वार्थ भरा है इसमें मेरा,शामिल है अभिमान।
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कविता में लिखे शब्दों से मिल सकता है ज्ञान,
पढ़े इसे श्रोतागण लेकिन पहले यह ले जान,
विश्व-ज्ञान पढ़ने पर इसको तुम्हे विदित हो जायेगा ,
छूटे सभी विसंगति जग में, छूटे न अभिमान।
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ब्राह्मण,पंडितों के चरणों में पड़ता है जजमान,
अपने पापों को धोता है कर गंगा स्नान,
हवन करता नित पुनीत अनल में ,गंगाजल खूब चढ़ाता है
कर्म करे यह सारे फिर भी जाता ना अभिमान।
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सूरज निकले उससे पहले जग जाता इंसान,
समय निकाल पढ लेता है दिन भर पांच अजान,
माला जपता है, मस्जिद चक्कर भी खूब लगाता है,
खुदा-खुदा रहता है जुवां पर औ' रहता अभिमान।
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सुबह-सुबह क्यों शोर मचाता,अन्य करे विश्राम,
कोई धुआं उड़ाता घर से करे प्रकृति-नुकसान,
धर्म-भेद से परे है जग में वही स्वच्छन्द घूमता है,
जीवन जिसका साधारण है जिसमे ना अभिमान।
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झुके मूर्तियों के समक्ष, खड़े मनुष्य हैरान,
पोथी-पत्रों में मोक्ष ढूँढ़ते हो चुके सब परेशान,
इतिहास साक्षी है जग में मोक्ष उसी को मिलता है,
जो आग लगा पोथी-पत्रों में छोड़ता है अभिमान।
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जगत जीतने से नहीं बनता कोई सम्राट महान,
युद्ध से जीती हुई धरा पर नहीं मिलता सम्मान,
इतिहास साक्षी है जग में गुणगान उसी का होता है,
दया,करुणा,सह्नशीलता जिसमे औ' ना हो अभिमान।
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इंद्र को कर दिए कर्ण ने कानन-कुण्डल दान,
कवच-रहित लड़ा था रण में रश्मिरथी महान,
कर्ण-वध महाभारत में क्या हो पाता संभव कभी,
निहत्थे कर्ण पर वार ना करता यदि छोड़ अर्जुन अभिमान।
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धन-कुबेरों की तिजोरी में बंद है उनकी जान,
मदांध दुनिया ताकत,दौलत में, हाय, कैसी अज्ञान,
कोई सूक्ष्म रखता है यहाँ पर कोई रखे विशाल
अपना-अपना जीवन और अपना-अपना अभिमान।
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शोर भले हो जग में सन्नाटा रखता है श्मशान,
सन्नाटो में चीख-चीख कर देता है यही ज्ञान,
मिट्टी का जो बना हुआ था, मिट्टी में मिल गया यहीं,
जग में लिए जिसे घूमते अब कहाँ वह अभिमान ?
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प्राप्त शान्ति हुई नहीं करे पुण्य औ' दान,
धर्मग्रंथ पढ़ लिए सभी, मिला यही बस ज्ञान,
शांति-सुख पाकर जग में वही प्रसन्न चमकता है,
पुण्य-दान भले करे ना जिसने, बस ना करा हो अभिमान।
-विश्वजीत सिंह
