Saturday, 26 August 2017

अभिमान......

कागज़ पर लिखे विचारों को करता हूँ प्रदान,
बस्ती-वन में लहरा दो, पढ़ ले पथिक अनजान,
निष्पक्ष भावों को पिघलाकर लिखी नहीं कविता मैने,
स्वार्थ भरा है इसमें मेरा,शामिल है अभिमान।
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कविता में लिखे शब्दों से मिल सकता है ज्ञान,
पढ़े इसे श्रोतागण लेकिन पहले यह ले जान,
विश्व-ज्ञान पढ़ने पर इसको तुम्हे विदित हो जायेगा ,
छूटे सभी विसंगति जग में, छूटे न अभिमान।
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ब्राह्मण,पंडितों के चरणों में पड़ता है जजमान,
अपने पापों को धोता है कर गंगा स्नान,
हवन करता नित पुनीत अनल में ,गंगाजल खूब चढ़ाता है
कर्म करे यह सारे फिर भी जाता ना अभिमान।
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सूरज निकले उससे पहले जग जाता इंसान,
समय निकाल पढ लेता है दिन भर पांच अजान,
माला जपता है, मस्जिद चक्कर भी खूब लगाता है,
खुदा-खुदा रहता है जुवां पर औ' रहता अभिमान।
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सुबह-सुबह क्यों शोर मचाता,अन्य करे विश्राम,
कोई धुआं उड़ाता घर से करे प्रकृति-नुकसान,
धर्म-भेद से परे है जग में वही स्वच्छन्द घूमता है,
जीवन जिसका साधारण है जिसमे ना अभिमान। 
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झुके मूर्तियों के समक्ष, खड़े मनुष्य हैरान,
पोथी-पत्रों में मोक्ष ढूँढ़ते हो चुके सब परेशान,
इतिहास साक्षी है जग में मोक्ष उसी को मिलता है,

जो आग लगा पोथी-पत्रों में छोड़ता है अभिमान।
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जगत जीतने से नहीं बनता कोई सम्राट महान,
युद्ध से जीती हुई धरा पर नहीं मिलता सम्मान,
इतिहास साक्षी है जग में गुणगान उसी का होता है,
दया,करुणा,सह्नशीलता जिसमे औ' ना हो अभिमान। 
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इंद्र को कर दिए कर्ण ने कानन-कुण्डल दान,
कवच-रहित लड़ा था रण में रश्मिरथी महान,
कर्ण-वध महाभारत में क्या हो पाता संभव कभी,
निहत्थे कर्ण पर वार ना करता यदि छोड़ अर्जुन अभिमान।
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धन-कुबेरों की तिजोरी में बंद है उनकी जान,
मदांध दुनिया ताकत,दौलत में, हाय, कैसी अज्ञान,
कोई सूक्ष्म रखता है यहाँ पर कोई रखे विशाल 
अपना-अपना जीवन और अपना-अपना अभिमान। 
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शोर भले हो जग में सन्नाटा रखता है श्मशान,
सन्नाटो में चीख-चीख कर देता है यही ज्ञान,
मिट्टी का जो बना हुआ था, मिट्टी में मिल गया यहीं,
जग में लिए जिसे घूमते अब कहाँ वह अभिमान ?
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प्राप्त शान्ति हुई नहीं करे पुण्य औ' दान,
धर्मग्रंथ पढ़ लिए सभी, मिला यही बस ज्ञान,
शांति-सुख पाकर जग में वही प्रसन्न चमकता है,
पुण्य-दान भले करे ना जिसने, बस ना करा हो अभिमान।


                                                                                                        -विश्वजीत सिंह












Tuesday, 22 August 2017

वीर-एक परिचय

सामर्थ्य है अनंत जिनकी भुजाओं में
बातें वृथा करते नहीं है जो हवाओं में
सहर्ष स्वीकारते है जीवन में जो सहा                        
भीड़ में घूमते नहीं है जो यहाँ-वहां।

परिणाम में देखते नहीं कभी वे अपना लाभ
सज्जन है वे भीड़ से कहते है पहले आप
रहते है उत्साहित परन्तु होते नहीं अधीर
उन्ही के मस्तक पर सुसज्जित होता विजय-अबीर

पर्वत झुके जाते है जिनके सामर्थ्य के सामने 
काल भी दिशा बदलता है उन्ही के सामने
कार्यों से सिद्ध करते है वे अपना जन्म
धन्य होती है धरा उठाकर उनके कदम।

करोड़ों में चमकता दीखता है एकमात्र जो ,
लक्ष्य से भटकता नहीं है लेश-मात्र जो
बल से नहीं अपितु लेता बुद्धि से काम जो
सफल होता है जग में कमाता है नाम वो

कठिन परिस्थिति हो भले रहते हैं वे अड़े
शत्रु हो बहुतेरे परन्तु रहते है वे खड़े
तोड़ देते है आ जाये समक्ष पर्वत विशाल जो
वीर अपने प्रताप से छका देते है काल वो।

अपने प्रताप से देता जो समुद्र को सुखा
काल भी इन्ही के समक्ष है दीखता झुका
राहों में हमेशा जिसके बिछी काँटों की सेज है
बोझ कंधो पर पड़े फिर चलता वह तेज है
चल पड़ा अगर वो फिर न कभी रुका
इसी काल में अपने ऋण देता सभी चुका।

हिंसा करते नहीं रखते तन शुद्ध है
प्रार्थना करते है रखते मन शुद्ध हैं
परिस्थिति इनके समक्ष भले विरुद्ध है
संकट में है फिर भी रखते चरित्र शुद्ध है।

कर्म करना ही यहाँ जिनका धर्म है
व्यर्थ समय गवाना लगता जिन्हे अधर्म है
परोपकार करना जिनके लिए सुकर्म है
निर्णय लेते दृढ रखते स्वभाव नर्म है
अधिकार जन्म के माध्यम लेते नहीं कभी
कर्म से अपने इसको कमा लेते यहीं।

कार्य-चुनाव में अपना स्वार्थ जो नहीं सोचते
सफलताओं को अपनी जी से नहीं है जोड़ते
अथक परिश्रम से यहाँ जो कभी बचते नहीं 
कार्य कठिन हो भले ,बोझ-तले दबते नहीं 
संसार की अग्नि में जब खुद है वे जले 
तपकर निकले जब , विश्व को महापुरुष मिले।

हर पल यहाँ ये मेहनत करते हुए दीखते
कोई पल ऐसा नहीं जिसमे कुछ ये नहीं सीखते
स्थिर रहते है सब ,तब करते चरित्र-विस्तार ये
नए सवेरे में करते है नव निर्माण ये।

कार्य करके उदाहरण बन जाते है जो
असफलताओं का अपनी कारण न देते जो
शरीर जिनका दुरुस्त ,मस्तक तना हुआ
वही वीर शिखर पर बैठा है महान बना हुआ।


                                                                                            --विश्वजीत सिंह































Saturday, 19 August 2017

कोरे कागज़ के किनारे ......

[यह कविता प्रथम दृष्ट्या निराशावादी लगती है किन्तु अगर इसे नीचे से ऊपर पढ़ा जाये तो यह आशावादी हो जाती है। यह प्रमाण है इस सत्य का कि कोई भी परिस्थिति निराशावादी नहीं होती ,जरुरत होती है तो केवल अपना दृष्टिकोण बदलने की ]
[ यह कविता इस बात का भी उदाहरण है की शब्द शक्तिशाली होते है। अगर इस कविता से 'फिर ' हटा दिया जाये तो यह निरर्थक हो जाती है ]


कोरे कागज़ के किनारे 
कुरेदी कु कामनायें
लम के माल के कारण

फिर 

सूखी स्वप्न-स्याही सारी ,
रका मय, रके भी संगी-साथी ,
स्त-मोला तवाला मैं
संसार,मय से संघर्षरत
का था ,मा था

                                                                                  -विश्वजीत सिंह

Thursday, 17 August 2017

जयद्रथ वध...........

This is the second part of a two part poem whose first part was अर्जुन की प्रतिज्ञा।
                                                     [विकिपीडिया से लिया हुआ चित्र ]


कौरवों के लिए आज कैसी है ये स्थिति विकट ,
जयद्रथ को दीखता है आज अपना अंत निकट ,
प्रतिज्ञा की ज्वाला धधकती है अर्जुन की नेत्र में ,
देखते है अब क्या होगा आज कुरुक्षेत्र में।

सूर्य की पहली किरण ज्यों ही धरती पर पड़ी ,
गांडीव पर अर्जुन के उसकी प्रतंच्या चढ़ी ,
सूर्य आकाश में जैसे-जैसे चढ़ता गया ,
कपिध्वज-रथ विद्धवंस मचता वैसे-वैसे बढ़ता गया।                       [कपिध्वज-रथ =अर्जुन-रथ ]

दुर्योधन ने जयद्रथ-सुरक्षा द्रोण कंधो पर रखी  ,
पद्म-व्यूह योजना द्रोण ने फिर जयद्रथ-सुरक्षा हेतु रची ,
बढ़ रहा अर्जुन रण में लिए जयद्रथ-वध की कामना ,
आ गया व्यूह के समक्ष अब होना है द्रोण से सामना।

सहस्त्रों बाण निकल रहे आज अर्जुन की कमान से ,
परन्तु रण में खड़े द्रोण है एक अडिग चट्टान से ,
समक्ष द्रोण के हर युक्ति दिख रही आज विफल है,
परन्तु श्री कृष्ण रखते हर समस्या का हल है।

श्री कृष्ण ने अर्जुन से फिर कुछ ऐसा कहा
सुन कर जिसे पार्थ ने शस्त्रों का अपने त्याग किया,
देख कर अर्जुन को निहत्था, हैरान है सभी यहाँ ,
अचंभित हो द्रोण ने फिर अर्जुन से यह कहा ,
"मैंने यह सीख तुम्हे क्या गुरुकुल में सिखलायी नहीं 
कि रण में शस्त्रों का त्याग एक योद्धा कभी करता नहीं 
ऐसा कृत्य जो करे, मेरा शिष्य हो सकता नहीं ,
मेरा सामना करने योग्य लगता तुम में सामर्थ्य नहीं ,
हे पार्थ! यह दुविधा जो तुम्हारे मन में है पनप गयी ,
तो सुनो इसके केवल हो सकते है दो अर्थ ही 
या तो तुम कायर हो ,योद्धा कहलाने लायक नहीं 
अथवा ओर से तुम्हारी पराजय है स्वीकारी गयी"।

सुन कर द्रोण के कठोर वचन श्री कृष्ण है मुस्कुरा रहे ,
उनकी आज्ञा पाकर फिर अर्जुन ने यह वचन कहे ,
"गुरुकुल में जो है सीखा, मुझे है सब कंठस्थ याद ,
यही शिक्षा तो बन गयी है आज रण में मेरा विषाद  ,                                 [ विषाद =दुःख ]
अब तक गुरु से युद्ध किया, यह रहा मेरा प्रमाद ,                                     [प्रमाद =गलती ]
करता हूँ लेकिन अब मैं अपने सभी शस्त्रों का त्याग ,
गुरु से मिले जो मुझे, स्वीकार है वह पराजय भी आज"। 

सुन कर अर्जुन के वचन भगवन पुन: मुस्कुरा रहे ,
नेत्रों-नेत्रों में द्रोण को सब वचन है समझा रहे ,
द्रोण ने मार्ग छोड़ा ,मन उनका था पिघल गया ,
"विजय भव अर्जुन" अनायास ही मुख से निकल गया।

अब पथ खुला है अर्जुन का,गांडीव ऐसे वह चला रहा,
युद्ध-क्षेत्र में चारों और त्राहि-त्राहि है मचा रहा ,
सैकंडो योद्धा रण-क्षेत्र में आज है अर्जुन से भिड़े,
प्राणो से मुक्ति पाकर अब दिख रहे भूमि पर पड़े। 

सूर्यास्त है निकट, कुछ ही घड़ियाँ अब  शेष रहीं
व्यूह के भीतर अर्जुन है फिर भी दिख रहा जयद्रथ नहीं
अब तो लगभग तय है की अर्जुन की जलेगी चिता यहीं।

अर्जुन की व्यथा को देखकर श्री कृष्ण ने उपाय कर दिया,
अपने सुदर्शन चक्र से विशाल सूर्य को ढक दिया ,
दोनों सेनाओं को अब सूर्यास्त का था भ्रम हुआ ,
युद्ध समाप्ति का घोतक दोनों और शंख-नाद हुआ ,
जयद्रथ प्रसन्न है समक्ष अर्जुन के खड़ा ,
कहना लगा तू मुर्ख है ,व्यर्थ ही इतना लड़ा ,
अब जला चिता मेरे समक्ष जैसा था तूने प्रण लिया।

अर्जुन निःशब्द है आज कुरुक्षेत्र में खड़ा
आत्मदाह से पूर्व कृष्ण-आशीर्वाद लेने बढ़ा ,
जो इस संसार को अपनी इच्छा से रहे चला ,
ऐसे कृष्ण ने अर्जुन-मस्तक पर हाथ रखते हुए कहा
"गुरु का आशीर्वाद अपने क्या तुमको स्मरण नहीं ,
ऐसे शिष्य को रण-क्षेत्र में मिल सकती कभी पराजय नहीं ,
है विजय-आशीर्वाद गुरु का जिस पर,जा सकता ऐसे व्यर्थ नहीं,
जिस सूर्यास्त से, हे पार्थ! आज तुम्हारा संताप है ,                                
वह सूर्यास्त है नहीं ,मेरे सुदर्शन का प्रताप है ,
उठा लो गांडीव तुम जो धरती पर है पड़ा हुआ ,
सूर्य अभी ढला नहीं बस सुदर्शन से है ढका हुआ ,
उठा कर गांडीव तुम जयद्रथ-वध कर दो अभी 
अंतिम किरण सूर्य की धरती पर नहीं पहुंची अभी"।

अर्जुन उसी क्षण गांडीव की ओर बढ़ा ,
उठा लिया गांडीव उसने ,लिया उस पर पशुपता चढ़ा ,
दिख रहा है जयद्रथ-मस्तक अपनी पिता की गोद में पड़ा ,
पांडवों में उल्लास है ,पूर्ण अर्जुन का प्रण हुआ ,
चौदहवे दिवस का आज खत्म है रण हुआ ,
श्री कृष्ण के प्रताप से इस तरह जयद्रथ-वध हुआ।
 


                                                                                               --   विश्वजीत सिंह
























Monday, 14 August 2017

अर्जुन की प्रतिज्ञा........

This is a two part poem ,the parts being a) अर्जुन की प्रतिज्ञा b) जयद्रथ-बध। ..... Currently, first part is being published here.........


विश्व-प्रेरणा जो बना
उस इतिहास का प्रमाण है ,                           
यह धर्म-क्षेत्र महान है ,
यह कुरुक्षेत्र-मैदान है।

कुरुक्षेत्र में अब तक थे पितामह खड़े हुए ,
सेनापति थे जब तक रहे कौरव अड़े हुए ,
विडम्बना है ,अपनी विजय पर पांडव है शोकान्वित हुए
पतन भीष्म का हुआ, द्रोण सेनापति हुए।

तेरहवे दिवस कुछ प्रसंग है ऐसा हुआ ,
चक्रव्यूह की आड़ में अधर्म एक भयावह हुआ ,
द्रोण के समक्ष ये अपराध है कैसा हुआ ?
अभिमन्यु रण-क्षेत्र में निढाल है मरा हुआ।

अभिमन्यु-बध की सूचना ज्यूँ ही अर्जुन को मिली ,
क्रोध की हुंकार से समस्त-प्राणी सकल धरती हिली ,
कपकपाते हाथ है ,नेत्रों में उसके रक्त है ,
अर्जुन-मुख से फूटते आज बस यही शब्द है,
"अपनी मृत्यु का आवाहन आज है किसने कर दिया ?
धर्म की चिता जला ये अधर्म है किसने कर दिया ?
एक बालक के साथ रण में ये छल है किसने कर दिया ?
निहत्थे मेरे पुत्र पर प्राणघात है किसने कर दिया "?

अर्जुन ने श्री-कृष्ण से प्रसंग सारा जान लिया
रक्तिम-काया चमक उठी ,हो कुपित फिर उसने कहा
"प्रतिशोध जो ना लिया मिले मुझे मुक्ति नहीं,
जयद्रथ-बध जो रोक दे अब ऐसी कोई युक्ति नहीं ,
गांडीव की सौगंध खा प्रतिज्ञा लेता हूँ अभी ,
इस पार्थ के सामर्थ्य में जो कल रह जाये कुछ कमी,
सूर्यास्त से पहले अगर ,जयद्रथ-साँसे जो ना थमी ,
गांडीव को फिर त्याग कर भस्म हो जाऊँ तभी ,
कुंती-पुत्र अर्जुन की जल जाये फिर चिता यहीं,
कुंती-पुत्र अर्जुन की जल जाये फिर चिता यहीं "।

                                                                                           -विश्वजीत सिंह

















Saturday, 12 August 2017

मेरी साँसे अभी बाकी हैं.....

देखता हूँ मैं चारो ओर 
ना हर्ष है ,न उल्लास है ,
मेरे देशवासी स्वयं ही 
उड़ा रहे मेरा उपहास है। 

मेरा इतिहास पुनः तुमको 
आज मैं समझाता हूँ ,
भूल चुके हो जिसको तुम 
गाथा वह बतलाता हूँ। 

मेरे देशवासियों का था 
मुझ पर कभी अडिग विश्वास,
जब अन्य राष्ट्र थे बने नहीं 
तब का है मेरा इतिहास। 

मैं ही हूँ जिसकी रक्षा 
स्वयं करता भगवान है,
दक्षिण-पूर्व-पश्चिम में समुद्र 
उत्तर में हिमालय महान है। 

मैंने ही विश्व को सर्वप्रथम
सभ्यता का वरदान दिया,                         (सिंधु घाटी सभ्यता )
बहुदा -बहुदा जो लोग बसे
उन सबका सम्मान किया। 

मैंने ही विश्व को सर्वप्रथम
एक दिव्य लिखित ग्रन्थ दिया ,
वेदो के रूप में तुमको मैंने 
ज्ञान अमूल्य अनंत दिया। 

मैंने ही विश्व को सर्वप्रथम
सुगठित सुसज्जित धर्म दिया ,
जो सनातन था उस रूप में तुमको 
धर्म रूपी एक कर्म दिया। 

मैंने ही विश्व को सर्वप्रथम
दो ग्रन्थ बड़े ही भव्य दिए ,
रामायण ,महाभारत जैसे
ज्ञान रूपी महाकाव्य दिए। 

वो मैं ही था जिसने विश्व को 
दिए महावीर ,गौतम सिद्धार्थ,
उनके अनुसरण से तुम्हे मिला 
जीवन जीने का ज्ञान यथार्थ। 

मैंने ही महान सिकंदर के 
विश्व -विजय रथ को रोका ,
मेरे उपलब्धियों को देख-देख 
सारा विश्व था कभी चौंका। 

मैंने ही विश्व को सर्वप्रथम
शासन का सुलभ ज्ञान दिया ,
एक पुस्तक रूपी तुमको मैंने 
अर्थशास्त्र महान दिया।     

सीमा -विस्तार की लालसा में 
ना मैंने किसी का हनन किया ,
इस हिंसक दुनिया में मैंने 
प्रेम-दया का उदहारण दिया। 

जननी बन कर मैंने सदा 
इस विश्व को पोषित किया ,
विश्व-गुरु बना कर सभी ने 
 मुझको था कभी विभूषित किया। 

महापुरुष भी मैंने तुमको 
अनगिनत ,असंख्य दिए ,
महाराणा ,शिवाजी और लक्ष्मी
चरक,आर्यभट्ट ,कालिदास दिए। 

परन्तु अब मैं तुम्हारी शान नहीं 
क्यूंकि तुमको यह ज्ञान नहीं ,
जिस देश पर तुम करते गर्व नहीं 
वह बन सकता कभी महान नहीं। 

धर्म,जात-पात को लेकर 
विद्धवंस मेरा समीप है ,
लेकिन यह भी तुम जान लो 
अभी शेष आशा के कुछ दीप है। 

मुझ पर अभी भी जो करते गर्व 
ऐसे सैनिक महान है ,
मेरे शिक्षक ,मेरे युवा 
हाँ !यही तो मेरी शान है। 

इस स्वतंत्रता दिवस , मेरे बच्चों 
अपने मन में यह ठान लो ,
हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई 
सब भाई है ,यह मान लो।  

इस स्वतंत्रता दिवस , मेरे बच्चों
तुम कुछ ऐसा मंत्र करो ,
देह तुम्हारा स्वतंत्र है 
अब बुद्धि भी स्वतंत्र करो। 

ये विपदा कैसी आन पड़ी
शत्रु की नज़रें इधर झांकी हैं ,
बता दो तुम ऐ!भारतवासियों 
"मरा नहीं मै ज़िन्दा हूँ ,
मेरी साँसे अभी बाकी हैं 
मेरी साँसे अभी बाकी हैं"। 

                                                            --विश्वजीत सिंह 
  






                     





Thursday, 10 August 2017

चाणक्य (भाग १).........

सामर्थ्य के सामने जिनके नित पर्वत झुके ,
अत्याचारी शासकों के विजय-रथ है रुके ,
सहस्त्रों वर्षों में एक बार होता है उनका जन्म ,
धन्य हुई है धरती उठाकर उनके कदम।

भरी सभा में हो गया प्रसंग ऐसा एक बार,
उपहास ब्राह्मण का उड़ा ,आघात हुआ उस पर अपार,
वीर ब्राह्मण ने अपमान को था न सहा,
हो कुपित फिर दरबार में उसने कहा,
"ये खोलता हूँ अपनी शिखा ,बांधूगा उसको तभी ,
आ जाओगे घुटनों पर मेरे समक्ष जब तुम सभी ,
प्रण लेता हूँ कि मगध को मैं करूँगा नन्द-मुक्त
हाँ ,इसी काल से हो गया समझो तुम्हारा भाग्य-सुप्त"।

सुन कर ये दरबार में उसकी उड़ी थी खिल्लियां ,
अनभिज्ञ नहीं थे जानते तूफ़ान से पहले चमकती बिजलियाँ।
हीरे को शीशा समझ दिया दरबार से उसको निकाल ,
है सत्य यह कि कठिन समय में बुद्धि पर पड़ता अकाल।

कुंठा लिए अपने हृदय में उसका समय था बीतता
प्रतिशोध के पौधे को था वो अपने मन में सींचता।
समय जिसको बुझा दे ज्वाला वो ज्वाला नहीं ,
धीरज धरकर जो बने होती वही युक्ति सही।

सत्य है की भाग्य का पहिया निरंतर घूमता,
उड़ता है जो आसमां में वो धरा भी चूमता।
ये भाग्य था की ब्राह्मण अपनी राह में जब बढ़ रहा,
पड़ी उसकी नज़र ,बालकों का खेल जहाँ था चल रहा।
आभा थी एक बालक की ऐसी उन बालकों के मध्य
चंद्र जैसे है चमकता असंख्य तारों के मध्य।

उसकी छवि को देख कर दूर खड़ा वह ना रहा,
पहुंचा निकट ,बालक से फिर उसने कहा
"हो कौन तुम जो सूर्य से हो चमक रहे,
प्रताप है ये तुम्हारा या भाग्य के सहारे दमक रहे ?"

सुन कर इन वाक्यों को बालक ने कहा
"भाग्य क्या होगा मेरा, मैं चरवाहों में पला ,
आश्रित नहीं हूँ भाग्य पर चाहे यह जागे या रहे सुप्त ,
साधारण मैं नहीं कोई बालक और नाम है मेरा चन्द्रगुप्त। 

बालक के शब्दों को सुन उसने भाग्य उसका भान लिया 
मगधराज होगा ये बालक ऐसा था उसने ठान लिया। 
ले गया खरीद कर उस बालक को वह वहां 
ज्ञान-भूमि ,पुण्य-भूमि तक्षिला थी जहाँ। 

ज्ञान विधि-समस्त का वहां था उसको मिला ,
कलम और तलवार के विचित्र संयोग में था वो पला 
सोना था ,वर्षों तप कर अब वह कुंदन बना 
खेलने की उम्र में अपनी वह योद्धा बना। 

चन्द्रगुप्त को साथ ले, गया वह ब्राह्मण निकल 
घूमा उसने अपने पगों पर ये विशाल भारत सकल 
"हैं वीर जो और युवा है ,
अपनी शर्तो पर जिया है ,
जिनके लिए माँ ,माँ भारती है ,
 विजय गाथा जिनकी आरती है,
ऐसे युवान जो है त्रस्त अत्याचार से ,
आ जाये मेरे साथ लेकिन विचार के ,
इस पथ पर चलने वाले को मिलेगा अमरता का वरदान,
माँ भारती को मुक्त करना ये है सबसे पुण्य काम"। 
थे शब्द यही थे गूंजते रहते थे वे दोनों जहां 
जोशीले युवा सुन इनको खींचे आते थे तुरत वहां। 

समय बीता, देखते ही देखते उनके समक्ष 
हो गयी तैयार सेना नन्दो के विपक्ष
लेकर सेना को चन्द्रगुप्त ऐसा चला 
उसके प्रताप से सर्वप्रथम पंजाब था हिला 
चीरती हुई अत्याचार को चलती थी उसकी कटार
खेल खेल में जा पंहुचा नन्द साम्राज्य तक उसका विस्तार। 

अब परीक्षा की घडी थी ,भाग्य का ये खेल था 
चन्द्रगुप्त और नन्द की सेना का शेष मेल था। 

नन्द को जब मिली खबर तब उसने भीषण हुंकार किया 
"कर दूंगा नष्ट उस बालक को" ऐसा उसने था प्रण लिया। 
लेकर अपनी सेना विशाल वो जा पहुंचा मैदान में 
जहाँ खड़ा था चन्द्रगुप्त निर्भीक अपनी शान में।
देख कर हुए थे जिसे सिकंदर के हौंसले पस्त 
ऐसी विशाल सेना खड़ी थी अब चंद्र के समक्ष। 

अनुभवहीन सेना, युवा सेनानी क्या हो पाता सफल ?
पर सत्य है के समक्ष बुद्धि के बल होता हरदम विफल। 
साम-दाम-दंड-भेद से खेली जाती जो नीति 
उस नीति का ज्ञाता था वह ,जिसको कहते राजनीति। 

व्यस्त था जब नन्द युद्ध के काज में ,
छिड़ चुका था गृह्ययुद्ध उसके ही राज में 
अभी युद्ध शेष था किन्तु निर्णय था हो चुका 
मगध का अधिकार नन्द से कुछ क्षण में था छीन चुका। 

देखकर अपनी पराजय नन्द ने युद्ध रोक दिया 
अपनी संपत्ति और राज्य चन्द्रगुप्त को सौंप दिया 
बदले में चंद्र ने उसे अनुदान दिया 
राज्य छोड़ने की शर्त पर जीवनदान दिया। 

जब मगध को छोड़कर नन्द था चला 
मंत्री-प्रधान के आसान पर बैठा वही ब्राह्मण मिला। 
चकित हो नन्द ने उससे प्रश्न किया 
"हे विप्र वर !तुम कौन हो जिसने एक प्रण के लिए,
समस्त मेरे वंश का जड़ से विनाश किया" ?
"तुम जानना चाहते हो कि मेरा है नाम क्या ,
मैं अर्थशास्त्र का रचयिता ,कहते है मुझे चाणक्य"।

                                                                                      -विश्वजीत सिंह




















 















 




Tuesday, 8 August 2017

प्रार्थना (भाग २ )..........

निकलता है घर से तो दूर तक चलता है 
उड़ते है जो पंछी कभी तो उन्हें आसमां मिलता है। 

प्यार-मोहब्बत-इश्क़ में मिलावट बहुत है यहाँ ,
ये मिलता है तो सिर्फ माँ के पास ही खरा मिलता है। 

अभी वक़्त है तो माँ का दामन ओढ़ सो जाया करो 
यह सुकून यहीं है कहीं और नहीं मिलता है। 

माँ की हंसी में दो पल तुम भी मुस्कुरा लिया करो 
वक़्त गुजर जाता है फिर ये हसीं मंजर नहीं मिलता है। 

व्यस्त ना होना इतना की उनकी यादें उधड़ जाएँ 
यहाँ सिलने वाला इन्हे कोई दर्जी नहीं मिलता है। 

जो मुझ पर यकीं ना हो तो खुद आज़मा लेना 
ये वो दर है जहाँ सिर्फ प्यार मिलता है। 

मंदिर ,मस्जिद की कतारों से निकलो 'विश्वजीत'
माँ से बेहतर कहीं कोई खुदा मिलता है ?

                                                                                                       -विश्वजीत सिंह


Sunday, 6 August 2017

प्रार्थना (भाग १)

माँ ,मेरे अस्तित्व का आधार बन जा 
मैं जुगनू बन जाता हूँ ,तू रात बन जा। 

तेरे से बिछड़ूँ ,एक पल भी न जी सकूँ मैं 
मैं प्राण बन जाता हूँ ,तू श्वास बन जा।

तेरे साये में रहा हूँ ,रहूं हमेशा 
मैं परिंदा बन जाता हूँ ,तू आसमान बन जा। 

मै बढ़ ना संकू तेरे बिना कहीं 
मैं नाव बनता हूँ ,तू पतवार बन जा। 

तेरे जर्रे -जर्रे में मैं रहूं हमेशा 
मैं ईंट बनता हूँ ,तू मकान बन जा। 

मेरे होंठों पर सदा रहे तेरा जिक्र 
मैं कवि बनता हूँ ,तू कविता बन जा। 

मर कर भी न जुदा हो सकू तुझसे 
मैं भक्त बनता हूँ ,तू भगवान बन जा। 

उदहारण तो बहुत है प्रेम कहानियो के 
पर ऐ माँ ! तू मेरे संग एक मिसाल बन जा 
मैं बच्चा बनता हूँ फिर से 
तू फिर से माँ बन जा।
 
 




 

 

 

Tuesday, 1 August 2017

श्रीमान सुपुत्र.......

The blog in its introduction says that poems, short stories and novel series would be published here, so keeping up with its words first story,or rather i should say short story, is being published. 'It's always good to start things on a lighter note' has been my mantra always. So, keeping this mantra in mind, this story would be a HASYA KATHA. Cheers!!!!!.......

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हमारे सुपुत्र ने आज तक ऐसा कोई काम नहीं किया था जिस पर हम गर्व कर सकें। कमबख़्त ने आजतक हम पर सिर्फ बदनामी का कीचड ही उछाला था। अब हमें अपने सुपुत्र के नाम से जाने जाना लगा था , जिसका हमे बेहद अफ़सोस है। हिंदी व्याकरण में उसका कोई सानी था ही नहीं। एक बार इन विद्वान ने भरी मंडी में एक गरांडील शरीर की महिला को घास चरने वाले एक जानवर का विशेषण प्रदान कर दिया और विपरीत दिशा में आगे बढ़ गए। अब कहा तो पट्ठे ने सच ही था, लेकिन इस नश्वर संसार के भोले मानुषो को सच का ज्ञान नहीं। वह औरत मुड़ी तो उसने हमको अपने पीछे पाया। अब क्या बताये उनके पति देव जो गैंडे से भीमकाय शरीर वाले थे; उन्होंने ऐसी धुलाई की, कि न खाना खाने लायक रहे और न.........ख़ैर छोड़िये। लेकिन, इस बार हमें उस से बहुत से आशाएं थी क्यूंकि उसने ,और हमको पूरा यकीं है ,गलती से अपना नाम दोहा-गायन प्रतियोगिता में लिखवा लिया था। हमे भी आमों से मतलब था न की गुठलियों से इसलिए हमने अपने सुपुत्र को बुलाया और कहा " सुन कर बहुत अच्छा लगा कि तुमने दोहा-गायन प्रतियोगिता में हिस्सा लिया है। प्रतियोगिता कब है , ज़रा ये तो बतायो"?

सुपुत्र : परसो है।
हम    : अच्छा परसों है , फिर तो तुमने दोहे अच्छे से याद कर लिए होंगे। अच्छा ,ज़रा दो-चार पंक्तियाँ तो सुनाना ज़रा।
सुपुत्र  : वो पिता जी......... मैं वो.......... ।
हम     : क्या मैं वो ,ये वो लगा रखा है। सुधा, ज़रा मेरी कम्बच  ले आना।
सुपुत्र   : सुनाता हूँ ना पिता जी, मैं तो बस अपना गला साफ़ कर रहा था........ एह...हह. म। दोहा इस प्रकार है।
                                           'घर की मुर्गी और अदरक का स्वाद
                                            नाच न जाने आटा गीला'।
हम     : अबे,क्या बक रहा है। ये दोहे नहीं मुहाबरे है और वो भी गलत। घर की मुर्गी ,अदरक का स्वाद ये गलत...... [ अंदर से श्रीमती जी बोली]
श्रीमती: मुझे पहले से ही पता था कि तुम को मेरे हाथ का खाना अच्छा नहीं लगता है। मेर हाथ की बनी मुर्गी तुम्हे अदरक जैसी लगती है।
हम     : अरी चुप करो भाग्यवान। और तू ये कैसे दोहे याद किए तूने। चल कोई कुछ और सुना।
सुपुत्र  :  पिता जी , फिल्मी गाना सुनाऊ क्या ?
हम    : अरे नालायक दोहे सुना।
सुपुत्र  : हां तो सुनिए फिर
                                       'काकड़ पाथर जोड़ के मन का आप खोये ,
                                        बुरा जो देखन में चला मुझसे बुरा न कोई।'
हम    : ये तो सही बोला तूने तुझसे बुरा तो हो ही नहीं सकता कोई इस दुनिया में। अबे ये क्या रीमिक्स कर दिया तूने दोहे का , बेबकूफ की औलाद।
श्रीमती: हाय! इस आदमी को ज़रा भी शर्म नहीं है , छोटे छोटे बच्चो के सामने मुझे बेबकूफ बोल रहा हैं। बेटा ज़रा मेरा फ़ोन ला दे , बताऊ ज़रा पापा जी को की उनकी औलाद क्या क्या दिन  दिखा रही है मुझे।
  [ सुपुत्र तो कोई मौका तलाश रहे थे खिसकने का , वैसे तो वह कोई बहाना मार देता लेकिन आज तो परम आदरणीय और कर्तव्यपरायण पुत्र की भाँती चले फ़ोन लेने ]
हम    : अरे कहाँ भागता है , चुपचाप यहाँ बैठ। और श्रीमती जी पहली बात तो ये कि ये हमारा इकलौता लड़का है तो 'बच्चो' के सामने बेबकूफ बोलने वाली बात मिथ्या है और दूजी बात ये की ये ऊंट जितना बड़ा हो गया है। किसी भी कोण से ये छोटा नहीं है।  इतनी उम्र में इसके दादा जी ने कवितायेँ लिखना शुरू कर दी थी। और तीजी बात ये कि 'बेबकूफ की औलाद' का अर्थ ये भी हो सकता है की में बेबकूफ होऊं।
श्रीमती: फिर ठीक है।
सुपुत्र  : पिता जी! आप ये भूल रहे है की मेरी उम्र में दादा जी ने मदिरा पान भी करना शुरू कर दिया था। 
हम    : ( तनी हुई भवों से हमने उसे देखा ) चुप हो जा नालायक। कुछ और सुना।
सुपुत्र  : बहुत आसान दोहा है ,आपको समझ आएगा
                                         'रहिमन पानी बहाइये , पानी मिलता मुफ्त 
                                          नहीं नहाते रोज जो हो जाते है सुस्त। '
             पिता जी दोहा गलत है जानता हूँ लेकिन भावनाये सच्ची है।
हम    : वाह ! सही जा रहे हो बेटा। बुड्ढा होने जा रहा है , ऐसे तो तुझे प्रतियोगिता वाले अंतिम स्थान देने में भी अपनी बेइज़्ज़ती समझेंगे।
           [ हमने सोचा सख्ती से कोई फायदा नहीं है। हमारा पुत्र है , हम ही इसे सिखाएंगे ]
हम    : चल बैठ बेटा। अब मैं एक दोहा बोलूंगा और तुम उसे दोहराना।
                                           ' ऐसी वाणी बोलिये , मन का आपा खोये 
                                             औरन को शीतल करे आपहुं शीतल होये'
श्रीमती: शीतल ,शीतल कौन है ये शीतल? बताये देती हूँ की मायके चली गयी न तो सकपका जाओगे।
हम    :  अरे श्रीमती जी आपके कानपूर में हड़ताल है क्या ? तुम्हारे सपूत को दोहे याद करा रहा हूँ। तुम चुपचाप खाना बनायो। मुझे खाना आज ही खाना है कल नहीं, इतनी देर हो गयी है।

सुपुत्र  : पिता जी, दोहा सुनिए।
हम    : हां, सुनायो।
सुपुत्र  : 'ऐसी वाणी बोलिये जिससे झगड़ा होय......... सॉरी सॉरी....... तन का आपा खोए..... 
हम    : अबे मन का आप खोये।
सुपुत्र  : हां ,वही खोया पाया।
                                      'ऐसी वाणी बोलिये मन का आप खोये ,
                                       औरन को काजल करे और आपहुं काजल होये '
हम    :(गुस्से में) अरे ये काजल कौन है ? शीतल बोल शीतल।
सुपुत्र  :अच्छा पिता जी !हमेशा आपकी बाली का नाम , कभी हमे भी मौका दीजिये।
हम   :(क्रोध में) अरे नालायक, भाग यहाँ से। शीतल काजल लगा रक्खा है यहाँ।
श्रीमती: (अंदर से ) शीतल से मन नाही भरा तुम्हारा , अब ये काजल को भी ले आये तुम।  हाय राम!मैं बर्बाद हो गयी।
हम   : अरे मूर्ख ! काजल तो तुम्हारा बेटा चिल्ला रहा था। मुझ पर काहे इलज़ाम लगाती हो।
श्रीमती: बेटा सब अपने माँ -बाप से ही तो सीखता है।
हम   : ये बात तो सोने माफिक खरी बोली तुमने। आज मुझे समझ आ गयी की हमारे बेटा इतना मुर्ख क्यों है।
श्रीमती: क्या? मै समझी नहीं।
हम   :(कुटिल मुस्कान के साथ ) अगर तुम ये बात समझने लायक होती तो मैं ऐसी बात बोलता ही नहीं।
                             [बेटा उठ कर भाग जाता है ]

उसके जाने के बाद हमने गहन -चिंतन कर यह निष्कर्ष निकाला कि समय की अथक मांग यह है कि हम अपनी इज़्ज़त बचाने हेतु उसे सिखाएं , जिताने के लिए नहीं , बस इसलिए की वो प्रतियोगिता में आखिरी न आये।
शाम को हमने उसे बुलाया और एक मोटी दोहे की पुस्तक, जो की हमने अपने मित्र बनबारी लाल जी से उधार ली थी ,उसे पकड़ाते हुए आदेश दिया की इसमें से ४-५ दोहे हमें याद करके सुनाये। इतना कह कर हम किसी काम से बाहर चले गए।
जब हम वापस आये तो हमारे सपूत अंदर बैठे कुछ बड़बड़ा रहे थे।
सुपुत्र  : सुनीता ,जब से तुम्हे देखा है खो सा गया हूँ ,
             शोर भरे माहौल मेँ जैसे सो सा गया हूँ। मेरा प्यार..........
हम   :( हम उसे टोकते हुए बोले ) गधे रुक ज़रा ! मै करवाता हु तुझे अभी प्यार।
सुपुत्र: वाह....... खुद की पुस्तक में प्रेम पत्र और डाँट डपट हमारी। अम्मा को बोलयूं क्या अभी ?
हम   : क्या बकता है ? ला दिखा ज़रा। ( वह सच में प्रेम पत्र ही था। बनबारी जी ने भी अच्छा फंसाया। हम बात सँभालते हुए बोले ) मै तो....... ये मेरा नहीं है...... चल , ये पकड़ पचास रुपये और मामले को रफा दफा कर।

  [ बनबारी जी ने भी अच्छा फंसाया , खुद दो बच्चों के बाप हैं लेकिन मन बड़ा ही चंचल है उनका। हमने पत्र को देखा और सोचा बनबारी जी को फंसाया जाये। सोचकर बनबारी जी का चेहरा लाचार, मन में उठा एक कुविचार ,क्यों न किया जाये इन पर अत्याचार ,इसी सोच को ले हम हुए अपनी बाइक पर सवार। बनबारी जी के घर पहुंचे। भाभी जी सामने थी। हम सीधे उनके पास गए और मन में जो कुछ था उगल दिया।  ]

हम   : भाभी जी , बनबारी जी से दोहों की पुस्तक ले गया था , पता नहीं ये कोई पत्र निकला है , क्या लिखा है इसमें , हाँ
               ' सुनीता , तुम्हे देखा है जबसे अधूरी कहानी हो गया हूँ
                 हैंडपंप बिना पानी हो गया हूँ ,
                 रातों को देर तक जागता हूँ ,
                 तुम्हारे घर के......... ( हमे बीच में ही टोक दिया गया )
भाभी जी :  बस भाई साहब ! मुझसे कहते हैं की मुझे अनिद्रा हो गयी है , आज इन्हे इक्कठा सुला दूंगी। 'ज़रा सुनते हो' कहते हुए वे दनदनाती हुई ऊपर चली गयी।
          [हम चुपचाप वहां से खिसक लिए। 'हाय राम मार डाला ,अरे मेरी नाज़ुक कलाई तोड़ेगी क्या'? जैसी भयंकर चीख की आवाज़े उनके घर से आने लगी। खिड़की से एक जूता उड़ता हुआ हमारे सामने आ गिरा। हमने उसे देखा फिर ऊपर देखा और फिर बनबारी जी की  कुटी हुई शक्ल को याद करते हुए मुस्कुराकर आगे बढ़ गए। 
हम जब घर पहुंचे तो देखा के सुपुत्र चादर ताने कुम्भकरण की भांति अपने को नींद के आँचल में समर्पित कर चुके थे। अगले दो दिन तक यही क्रम चला और आख़िरकार प्रतियोगिता की घडी आ ही गयी। 
            हम अपने सुपुत्र को ले उसके स्कूल पहुंचे। उनके प्रधानाचार्य से मिले जो शक्ल से बड़े सज्जन मालूम पड़ते थे परन्तु असल में बड़े उज्जड टाइप के थे।  हर किसी को शक भरी निगाहों से देखते थे। अभी प्रतियोगिता में एक घंटा बाकी था इसलिए सोचा की बाहर घूम कर आया जाये।  बाहर चले तो गेट पर चपरासी बोला " देहाती लगते हो , अंदर किसने आने दिया '? हम बोलना चाहते थे लेकिन गुस्सा पी गए और बाहर निकले। एक खोखे के पास पहुँच कर सोचा की बीड़ी पी ले , लेकिन फिर ख्याल आया की अगर हमारे सुपुत्र के मित्र हमे बीड़ी पीता देखेंगे तो क्या सोचेंगे।  क्या सन्देश जायेगा उन युवाओं को , इसी विचार से हमने बीड़ी को त्याग, सिगरेट की तरफ अपना ध्यान बढ़ाया। हमने सिगरेट खरीदी और वहीँ बैठ गए। वहां पर कुछ चार पांच आदमी बैठे थे और कुछ बात कर रहे थे। ]

पहला : सुना है चौराहे के पीछे वाले त्रिपाठी जी इस बार चुनाव लड़ेंगे।
दूसरा : हां , उन्होंने रिश्वत ली  है।
तीसरा : अरे मैंने तो यहाँ तक सुना है की उन्होंने एक कनस्तर सरसों का तेल रिश्वत लिया है।
चौथा   : बैल कोल्हू या रविंद्र ब्रांड ?
तीसरा : रविंद्र ब्रांड , उसके साथ पेन भी फ्री मिलता है।
चौथा: अच्छा, तभी वह अपना पेन मुझे देने से मना कर रहे थे।
पहला  : तुम्हे क्या लगता है कि त्रिपाठी जी जीत पाएंगे?
दूसरा  : हाँ क्यों नहीं। भले ही उनका वोट बैंक कमजोर हो पर उनका नोट बैंक तगड़ा है।
तीसरा : यार मैंने सुना है की त्रिपाठी जी को सड़क के पागल कुत्ते ने काट लिया था।
पहला  : अच्छा !फिर क्या हुआ ?
तीसरा : होना क्या था , कुत्ते की दर्दनाक मौत हो गयी।
दूसरा : अरे तुम लोग नहीं समझते हो ! सब चुनाव जीतने के हथकंडे है।  अब त्रिपाठी जी चुनाव रैली में सबको अपनी बहादुरी के किस्से सुनाएंगे कि किस तरह उन्होंने अकेले ही विपक्ष के कुत्तों की फ़ौज का सामना किया  और सबको मज़ा चखाया और इस चक्कर में उन्हें काट लिया गया।
        [वे सब उठ कर जाने लगे ]
दूकानदार :  अरे भाई साहब , रुपये तो देते जाइये।
पहला : कैसे पैसे ?
दूसरा  : कौन से पैसे ?
तीसरा : कहाँ के पैसे ?
चौथा   : अबे किस बात के पैसे ?
दूकानदार : जो सिगरेट तुम लोगों ने यहाँ बैठ कर हवा कर दी उसके पैसे।
पहला :   मैंने अभी तो दिया तुम्हे दो सौ का नोट।
दूकानदार : (चौंकते हुए ) दो सौ का नोट?
दूसरा   : हाँ वही १०० -१०० के दो नोट।
तीसरा : अबे वो ही 50 -50 के चार नोट।
चौथा   : अरे हाँ २० -२० के बीस नोट।
दूकानदार  : आप कमाल करते हो बीस -बीस के बीस नोट तो चार सौ हुए , दो सौ नहीं।
पहला  : अच्छा तो हमने तुम्हे चार सौ रुपये दिए है।
दूकानदार  : नहीं , अपने मुझे..........
पहला  :  दो सौ दिए ,अच्छा कोई नहीं , छुट्टे रख  चलते है।
         [चारों वहां से चले गए।  दुकानदार और हमने एक दूसरे के मुँह को देखा , हमने उसे रुपये दिए और फिर स्कूल में जाकर सामने की पंक्ति में अपना स्थान लिया।  प्रतियोगिता शुरू हुई और एक के बाद एक प्रतियोगी आने लगे।  आखिरकार हमारे सुपुत्र भी स्टेज पर आ गए। तालियों की गड़गड़ाहट के साथ हमारे पसीने छूटने लगे। ]

सुपुत्र   : दोहा -गायन की इस प्रतियोगिता में मैं सरस्वती माँ के आशीर्वाद से गाना शुरू करता हूँ।
                                 'रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाए ,
                                  टूटे से जुड़ न पावे जो फेविकोल तब लगाए।'
             
              [ जनता में रोष उत्पन्न होने लगा , परन्तु हमारे सुपुत्र अपने गधे का राग अलापने में मशगूल थे। ]
            वह आगे बोला ' रहिमन फ्रेंड कबीर का ,दोनों गावें दोहे '
                                    और ....................................
             [तब तक जनता में से कोई बोला ' अरे भगाओ इस नामुराद को.... और ना जाने क्या क्या। थोड़े ही देर में अंडे टमाटर की बरसात होने लगी और हम किसी तरह से अपने सुपुत्र को वहां से बचा कर घर लेकर आये और आगे से उसे कुछ भी सीखने से तौबा कर ली ].................................... 



                                                                                                                        --- विश्वजीत सिंह ............  




 













    




           


 












 

 














The Ballad of Thief and the Priest

The thief came in the dead of night, When lamps were burning low, He moved as softly as a thought Afraid the dark might know. He searched fo...